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सर्वकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 462, कुल 610 में से

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पृष्ठ 462

परिच्छेद ] सामान्य-लक्षण का खण्डन ४४३
नापि द्वितीयः; सामान्यस्य समवायस्य च नित्यत्वाभावप्रसङ्गात् । आत्म-
त्वादौ व्यक्त्यभावायत्तस्यापि विशिष्टाभावस्यासम्भवात् ।
तस्य च कदाचिदसत्त्वानङ्गीकारे तदनित्यत्वस्यैव वक्तुमशक्यत्वात् ।
तद्ग्राहिणश्च प्रत्ययस्यैककालिकस्य च मिथ्यात्वेऽविशेषात् सार्वकालिकस्य च
मिथ्यात्वप्रसङ्गेन सर्वथा तदसत्त्वापत्तेः । एकस्य च सत्यत्वेऽविशेषात् सर्वसत्य-
तायां कदाचिदपि तदसत्त्वं नास्तीति ।
एकदा तत्सम्बन्धेनोपलक्षितस्य अन्यदाऽपि विद्यमानत्वात् तथात्व-
मिति चेन्न । तादृशोपलक्ष्यासम्भवात्, व्यक्तीनां भेदादनित्यत्वानुपपत्तिरेवेति ।
एतेन नित्यत्वमन्यत्रापि प्रतिवचनीयमिति ।
द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं; कारण लक्षण में प्रविष्ट समवाय तथा लक्ष्य सामान्य
भी अनित्य मानने पड़ेंगे, तभी लक्षण अनित्य होगा । यदि कहें कि लक्षणघटक
व्यक्ति के अनित्य होने से लक्षण भी अनित्य है, तो जहाँ आत्मत्वादि-स्थल में
आत्मारूप व्यक्ति भी नित्य है, वहाँ लक्षण अनित्य कैसे होगा ?
किञ्च—लक्ष्य में कदाचित् भी लक्षण का असत्त्व न हो, तो लक्षण को अनित्य
नहीं कह सकते । फिर यदि लक्षण का कदाचित् असत्त्व मान लें और उस समय लक्षण-
विशिष्ट लक्ष्यग्रह भी मानें, तो उसके भ्रम होने से सर्वत्र भ्रम ही होगा । फलतः लक्षण
का सर्वदा असत्त्व ही पर्यवसित हो जायगा । यदि कहें कि 'जिस समय लक्षण वस्तुसत्
रहेगा, उस समय लक्षणविशिष्ट लक्ष्य-प्रतीति सत्य ही है। एवञ्च उसके सार्वकालिक
असत्त्व की आपत्ति नहीं आ सकती', तो वह भी ठीक नहीं । कारण एक को सत्य
मानें, तो अविशेषात् (विषय का बाध न होने से) सभी ज्ञान यथार्थ होंगे । फलतः
कभी भी लक्षण का असत्त्व बन नहीं पायेगा ।
यदि कहें कि लक्षण अपने असत्त्व-काल में भी लक्ष्य-सामान्य का उपलक्षण करता
है, अतः असत्त्वकाल में भी लक्षण से उपलक्षित लक्ष्य का ज्ञान भ्रम नहीं है, तो सामान्य-
रूप व्यक्ति भिन्न-भिन्न होने और सबमें वृत्ति एक कोई उपलक्ष्यतावच्छेदक धर्म न होने
से लक्षण उपलक्षण नहीं हो सकता । अतः इससे लक्षण में अनित्यत्व अनुपपन्न है !
इसी प्रकार अन्यत्र भी नित्यत्व का खण्डन जानना चाहिए । जैसे—आकाशादि
का नित्यत्व यदि नित्य है, तो आत्माश्रय होगा और यदि अनित्य है, तो आकाशादि भी
अनित्य हो जायेंगे । इसी प्रकार नित्यत्वघटित लक्षणान्तरों का भी खण्डन करना चाहिए ।