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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 460, कुल 610 में से

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पृष्ठ 460

परिच्छेद ] सामान्य-लक्षण का खण्डन ४४१
असाधारणविशेषादनन्यजातीयप्रयोजकत्वञ्च तदिति चेन्न । स्वसामग्र्या-
मपि प्रसङ्गात्तादवस्थ्यात्, भेदप्रतिपत्त्यादावपि प्रयोजकत्वाच्च ।
एतत्प्रतिपत्तिप्रमाणकत्वमिति चेन्न । स्वसामग्र्यामप्यस्याः प्रमाणत्वात् ।
एतदेकप्रमाणकत्वमिति चेन्न । अर्थक्रियाभेदादेरपि तत्र प्रमाणात्वात् ।
एतत्प्रतिपत्तिप्रमाकत्वमिति चेन्न । तद्विशिष्टस्यापि तत्त्वप्रसङ्गात् । तद्व-
समर्थन—'अनुवृत्त प्रत्यय का असाधारण कारण सामान्य है' यहाँ अनन्यजातीय
कार्य का अप्रयोजकत्व 'असाधारण' शब्द का अर्थ है । उक्त सामग्री या तदेकदेश
कार्यान्तर का भी प्रयोजक होने से उसमें अतिव्याप्ति नहीं है। खण्डन—स्वसामग्री भी
अन्यजातीय कार्य की अप्रयोजक होती है, अतः उसमें अतिव्याप्ति तदवस्थ ही है ।
किञ्च—सामान्य तो 'अयं न महिषः गोत्वात्' इस भेदानुमिति का भी कारण होता है ।
अतः वह भी अनुवृत्त प्रत्यय का असाधारण कारण नहीं है । फलतः असंभव
हो जायगा ।
समर्थन—'अनुवृत्त प्रत्यय है प्रमाण जिसमें, वह सामान्य है' ऐसा लक्षण करेंगे ।
अर्थात् 'असाधारण कारण' यहाँ 'कारण' शब्द का अर्थ 'प्रमाण' करेंगे । एवञ्च सामग्री के
कारण होने पर भी उसमें अनुवृत्त प्रत्यय प्रमाण न होने से अतिव्याप्ति नहीं है ।
खण्डन—कार्य से कारण की अनुमिति होने से स्वसामग्री में भी अनुवृत्त प्रत्यय प्रमाण
है, अतः पुनः स्वसामग्री में अतिव्याप्ति हो जायगी ।
समर्थन—'अनुवृत्त प्रत्यय ही है एकमात्र प्रमाण जिसमें, वह सामान्य है' ऐसा
कहेंगे । सामग्री में तो अन्य भी प्रमाण हैं, जैसे सामग्री का एकदेश चक्षु रूपज्ञान से
अनुमेय है और आलोक प्रत्यक्ष है । अतः स्वसामग्री में अतिव्याप्ति नहीं होगी ।
खंडन—अर्थक्रिया ( कार्यभेद ) आकस्मिक न हो, इसलिए कारणतावच्छेदकत्वरूप
से सामान्य की सिद्धि होती है, जैसे कि कार्य के समवायि-कारणतावच्छेदकत्व रूप से
द्रव्यत्वजाति की सिद्धि होती है । एवञ्च एकमात्र अनुवृत्त प्रत्यय ही सामान्य में प्रमाण न
होने से असम्भव हो जायगा ।
समर्थन—'अनुवृत्त प्रत्यय ही प्रमा जिसमें हो, वह सामान्य है' ऐसा लक्षण करेंगे।
खण्डन—सामान्य से विशिष्ट व्यक्ति में भी अनुवृत्त प्रत्यय ही प्रमा है, अतः व्यक्ति में
अतिव्याप्ति हो जायगी ।
समर्थन—'विषयरूप से सामान्य से अवच्छिन्न प्रमा जिसमें प्रमाण है, वह
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