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सर्वकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 450, कुल 610 में से

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पृष्ठ 450

परिच्छेद ] विशिष्ट-लक्षण का खण्डन ४३१
द्वितीये तु प्रत्येकं दण्डिव्यवहारप्रसङ्गो विशेषाभावात् ।
न ते प्रत्येकं दण्डिपदार्थाः, किन्तु मिलिता इति चेत्; मिलिता इति किं ते च
मेलकं चाभिधीयते, उत तेभ्योऽन्य एव कश्चित् ? आद्ये प्रत्येकं स एव प्रसङ्गः,
मेलकेऽप्यधिकः । द्वितीयस्तु प्रतीतिव्यवहारविरोधात्पूर्ववदेव निरस्तः ।
एकज्ञानारूढो वा अविरलनानाज्ञानारूढो वाऽनेकश्च सम्बन्धश्च विशिष्ट-
पदार्थ इति चेन्न । 'घटपटावि'ति बुद्ध्यारूढौ घटपटौ सम्बन्धश्च घटपटरूपो
विशिष्टः स्यात् । घटत्वपटत्वसम्बन्धानां तद्बुद्ध्यारूढानामभ्युपगमेन सम्बन्ध-
स्यापि तद्बुद्ध्यारोहोपगमध्रौव्यात् । अन्यथा घटत्वविशिष्टरूपो घटः पटत्वविशिष्ट-
रूपश्च पटः कथमभ्युपेयस्तत्र ।
खण्डन—दण्ड-पुरुषीयत्व से विशिष्ट भी विशिष्टमात्र नहीं है, किन्तु विशिष्ट-विशेष
ही है। वह अन्य है तथा दण्ड-पुरुष का सम्बन्धी भी नहीं है, अतः विशिष्ट का व्यवहार
दण्ड-पुरुष का आदान करके नहीं होगा । इस रीति से विशिष्ट-परम्परा के आश्रयण में
केवल अनवस्था होगी, व्यवहर्त्तव्य विषयगत विशेष का लाभ नहीं होगा ।
'विशेषण, विशेष्य और सम्बन्ध से अभिन्न ही विशिष्ट है', इस द्वितीय पक्ष में भी
दण्ड, पुरुष और सम्बन्ध प्रत्येक में दण्डी-व्यवहार हो जायगा ।
समर्थन—दण्ड, पुरुष आदि प्रत्येक दण्डी-पद का अर्थ नहीं, किन्तु मिलित
( समुदाय ) दण्डी-पद का अर्थ है। अतः प्रत्येक में दण्डी-व्यवहार नहीं होगा ।
खंडन—'मिलित' शब्द का अर्थ क्या है, दण्ड, पुरुष, सम्बन्ध और इनका समूह अर्थ
है या दण्डादि से अन्य ही समुदायरूप अर्थ है ? प्रथम पक्ष में प्रत्येक में भी विशिष्ट-
व्यवहार हो जायगा और समुदाय में भी विशिष्ट व्यवहार होगा—यह अधिक हुआ ।
द्वितीय पक्ष का पूर्व ही (विशिष्ट अन्य है, इस कल्प के खण्डन के समय में ही)
निराकरण कर आये हैं ।
समर्थन—एकज्ञान या अव्यवधान से उत्पन्न अनेक ज्ञानों के अनेक विषय
और सम्बन्ध विशिष्ट पद का अर्थ है । खण्डन—'घटपटौ' इत्याकारक बुद्धि का
विषय घट-पट तथा संबन्ध भी घट-पटरूप विशिष्ट हो जायगा, कारण घटत्व, पटत्व
और उनका संबन्ध उस ज्ञान के विषय होने से सम्बन्ध भी उस ज्ञान का विषय है
ही । यदि सम्बन्ध को उस ज्ञान का विषय न मानें, तो घट को घटत्वविशिष्ट तथा पट
को पटत्वविशिष्ट कैसे मानेंगे ?