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सर्वकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 448, कुल 610 में से

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पृष्ठ 448

परिच्छेद ] विशिष्ट-लक्षण का खण्डन ४२६
अन्यदेव तद्वदिति चेन्न । तद्द्भावस्याभावत्वे स्ववृत्तिः, भावत्वे च व्याघातात् ।
न द्वितीयः; तस्याऽऽत्मनि वृत्तौ विरोधापत्तेः, अवृत्तावव्यापकत्वप्रसङ्गादिति ।
प्रतिक्षेप्यविशिष्टमेव यत् प्रतिभाति सोऽभाव इति चेन्न । प्रतिक्षेपानिरुक्तौ
प्रतिक्षेप्यानिरुक्तेः ।
विशिष्ट-लक्षण-खण्डनम्
विशिष्टशब्दार्थश्च निर्वचनीयः स्यात् । तत्र विशिष्टं विशेषणविशेष्यतत्सम्ब-
न्धेभ्यो भिन्नमभिन्नं वा ? नाद्यः; दण्डपुरुषसम्बन्धमन्तरेण दण्डिनोऽन्यस्या-
प्रतीतेः । 'दण्डिनमानये'त्युक्तेऽतदानयनप्रसङ्गाच्च ।
तत्सम्बन्धेनोपलक्षितत्वात् तथेति चेन्न । अतद्गत उपलक्ष्यत्वेऽतिप्रसङ्गात् ।
तद्गतस्यान्यत्वात् ।
रहने से आत्माश्रय हो जायगा । लक्षणयुक्त अभाव को यदि भाव कहे, तो 'अभाव भाव
है' यह व्याघात हो जायगा ।
द्वितीय पक्ष भी ठीक नहीं, यदि लक्षण को अभावरूप मानें और उसे स्ववृत्ति भी
मानें, तो आत्माश्रय होगा । यदि अभावरूप लक्षण में लक्षण की स्थिति न मानें, तो
लक्षणरूप अभाव में ही लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी ।
समर्थन—'प्रतिक्षेप निषेध्य से विशिष्ट ही जो भासता हो, वह अभाव है' ऐसा
लक्षण करेंगे । खंडन—जबतक 'प्रतिक्षेप' शब्द के अर्थ की निरुक्ति न हो, तबतक
यह लक्षण दुर्बोध है । 'प्रतिक्षेप' शब्द के अर्थ की अभीतक निरुक्ति ही हुई नहीं है ।
विशिष्ट-लक्षण का खण्डन
किञ्च—'प्रतिक्षेप्यविशिष्टमेव' यहाँ अभावलक्षणघटक विशिष्ट पदार्थ का भी लक्षण
कहना होगा । वह कह नहीं सकते, क्योंकि वह विकल्पासह है । देखिये—विशिष्ट
विशेषण, विशेष्य और उनके सम्बन्ध से भिन्न है या अभिन्न ? प्रथम पक्ष युक्त नहीं,
कारण 'दण्डिनमानय' इस वाक्य के श्रवण के अनन्तर दण्ड-पुरुष-सम्बन्ध से भिन्न
किसी अर्थ की प्रतीति नहीं होती । यदि विशिष्ट को भिन्न मानें, तो 'दण्डिनमानय' इस
वाक्य के कथन के अनन्तर विशेषण-विशेष्य-सम्बन्ध से भिन्न का आनयन होना
चाहिए । किन्तु इनसे भिन्न का आनयन नहीं होता ।
समर्थन—विशिष्ट विशेषण-विशेष्य के सम्बन्ध से उपलक्षित होता है । अतः
विशिष्ट में होता हुआ व्यवहार विशेषण-विशेष्य में भी होता है । खण्डन—प्रकृत