खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] अपसिद्धान्त-लक्षण का खण्डन ४११
मशक्यत्वात् । शक्यत्वेऽपि वा तत्रापि स्वाभ्युपगमः किमित्यभ्युपेयो वैयर्थ्यात्,
उपायत्वादेव परस्य तथा प्रतीत्युपपत्तेः ।
अथोच्यते—उपेयमुपायेन साधयता उपेयवदुपायस्यापि सत्त्वमुपगन्तव्य-
मिति । पश्चात्तदनुपगमेऽपसिद्धान्तोपन्यासः सावकाशः, असत उपायत्वानुपपत्तेः ।
तद्ध्युपायत्वेनोपन्यसनात् तत्सत्त्वाभ्युपगमः, तस्य साक्षादश्रुतोऽप्यसत्त्वेनाभ्यु-
गम्यमानस्य उपायत्वस्वीकारानुपपत्त्या कल्पनीयः । कल्पितेन तेन श्रूयमाण-
तत्सत्त्वानभ्युपगमविरोधादपसिद्धान्तोऽभिधेयः । एवञ्च सति सत्त्वानभ्युपगम
एवोपायत्वानुपपत्तिप्रसङ्गो दूषणमुच्यतामुपजीव्यत्वात् , तदुपन्यासमन्तरेणाश्रूय-
माणतदीयाभ्युपगमस्य दर्शयितुमशक्यत्वात् कृतं तदुपजीविना पश्चात्तनेन
अपसिद्धान्तेन ।
अत एव न द्वितीयः ; तन्नान्तरीयकाभ्युपगमोऽपि हि तत्सत्त्वानभ्युपगमे
नहीं होगा, कारण उपाय और उपाय का अभ्युपगम दोनों की पृथक्-पृथक् कारणता में
कोई प्रमाण नहीं दिखा सकते । उपाय के स्वीकार की कारणता में कोई प्रमाण दिखा
सकें, तब भी उपाय का स्वीकार हम करें—यह व्यर्थ है, क्यों करें ? उपाय होने से ही
वादी उसे मान लेगा ।
समर्थन—कारण से कार्य का साधन करनेवाला कार्य के तुल्य कारण की सत्ता भी
अवश्य मानेगा । बाद में उसके न मानने पर वहाँ अपसिद्धान्त का अवकाश
रहेगा ही, क्योंकि सर्वथा असत् कभी कारण ही नहीं होता । खण्डन—तब तो आप
यही कहेंगे न कि असत्त्वरूप से स्वीकृत कारण नहीं होता और उसका कारणत्वरूप
से कथन है; अतः कारणत्व की अनुपपत्ति से साक्षात् अश्रुत भी कारण को स्वीकार
करना पड़ेगा । तथाच कल्पित कारण के स्वीकार से श्रूयमाण अस्वीकार का विरोध होने
के कारण अपसिद्धान्त हो जायगा । यदि ऐसा ही है, तो सत्त्व का अस्वीकार होने पर
कारणत्व की अनुपपत्ति को ही दूषण मानिये, क्योंकि अनुपपत्ति के कथन के बिना
अश्रुत कारण का स्वीकार दिखा नहीं सकते । अतः वह ( अनुपपत्ति ) उपजीव्य है ।
एवञ्च अनुपपत्ति से जनित, पीछे होनेवाले अपसिद्धान्त का उद्भावन व्यर्थ है ।
‘प्रकृत साध्य अपोह क्षणिकत्व का नान्तरीयक ( व्याप्य ) है, अतः उसके सत्त्व
से क्षणिकत्व का अभ्युपगम है’ यह द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं है; कारण क्षणिकत्व
के सत्त्व का स्वीकार न करें, तो प्रकृत साध्य अपोह का अभाव हो जायगा । अतः