खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 415, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] प्रतिबन्दी-लक्षण का खण्डन ३६५
अथ यं विशेषमादाय प्रतिबन्दी स्यात् तन्मात्रस्यानुद्भावनम्, न तु सामान्यत
एवेति चेन्न । तत्र विशेषे प्रतिबन्द्या त्याजितदुष्टत्वे गतत्वात्तल्लक्षणमेव नेति स्यात् ।
विशिष्य तद्विशेषत्याजने च तादृशस्य लक्षणस्यासिद्धिरेव स्यादिति
कृतं प्रतिबन्द्या ।
अथ मद्दर्शनमात्राभ्युपगततादृश्यत्वं किञ्चित्पदार्थं प्रतिबन्दीकरोति तदैतदुक्तं
तेन स्यात्—इह नेदं दूषणं वक्तव्यमित्यभिधानेऽनयैव युक्त्या तवेष्टभङ्गप्रसङ्गा-
दिति । तन्न; इदमीह दूषणं वक्तव्यम्, अनभिधानेऽस्यैवानिष्टस्य परसिषाधयि-
षितस्य सिद्धिप्रसङ्गादित्यभिधानानुकूलाया अपि प्रतिबन्द्याः सम्भवात् ।
नन्वेवमेवास्तु, तथाचाभिधानेऽनभिधाने चोभयतःपाशा प्रतिबन्दीरज्जुर्भवत
समर्थन.—असिद्धि के जिस प्रकार-विशेष को लेकर प्रतिबन्दी करते हैं, उस
दोष से विशिष्ट प्रकृत हेतु का उद्भावन नहीं होता । किन्तु सामान्यतः असिद्धि का
उद्भावन तो होता ही है । खंडन—प्रतिबन्दी ने जिस (असिद्धि) विशेष में
दोषत्व तो दूर कर दिया और असिद्धि का लक्षण है, उस स्थल में उक्त लक्षण की
अतिव्याप्ति हो जायगी ।
समर्थन —असिद्धि आदि दोषों के लक्षण में 'प्रतिबन्दी से त्याजित दुष्टत्व से
अन्य' ऐसा निवेश करने पर अतिव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन—यदि ऐसा है, तो
प्रतिबन्दी का उद्भावन व्यर्थ है, असिद्धि के लक्षण का अभाव है, केवल इतना
ही उद्भावन करना चाहिए ।
समर्थन —जहाँ 'प्रपञ्चः सत्यो व्यावहारिकत्वात्' इस नैयायिक के अनुमान में
वेदान्ती असिद्धि का उद्भावन करे और उस पर नैयायिक ऐसी प्रतिबन्दी का
उपन्यास करे कि “यदि मेरी अनुमिति में असिद्धि-दोष हो, तो 'प्रपञ्चो
मिथ्या व्यावहारिकत्वात्' इस आपके अनुमान में भी असिद्धि हो जायगी", वहाँ
उसका यही अभिप्राय है कि 'यहाँ इस दोष का अभिधान न करो, यदि करोगे, तो
इसी दोष से तुम्हारे इष्ट का भी भङ्ग हो जायगा ।' खंडन—'यहाँ दोष अवश्य कहना
चाहिए । यदि न कहेंगे, तो पर के सिषाधयिषित अनिष्ट का प्रसङ्ग हो जायगा',
ऐसे अभिधान के अनुकूल प्रतिबन्दी भी सम्भव हो सकती है ।
समर्थन—ऐसा ही रहे, क्या हानि है ? यदि असिद्धि का अभिधान करते हैं,
तो इसी दोष से मेरे अभीष्ट की असिद्धि होती है और यदि अभिधान नहीं करते,