खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 394, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] सत्प्रतिपक्ष-लक्षण का खण्डन ३७५
क्षितम् । एतदेव विचार्यते—किं प्रत्यक्षाभासादिभिर्विशेषितोऽसौ अन्योन्या-
भावस्त्वयोच्यते, उत तैरुपलक्षितः, यं प्रत्यक्षाभासादिष्वप्रसक्तं मन्यसे ?
आद्यस्तावन्न सम्भवति; न हि प्रतियोगिरूपविशेषणरहितोऽभावः
क्वचिदप्यस्ति । ततस्तादृशस्य विवक्षितत्वे सर्वाव्याप्तिः । द्वितीये तु प्रत्यक्षाभासा-
दिभिरुपलक्षणैर्यदुपलक्ष्यमन्योन्याभावस्य स्वरूपमेकं तत्प्रत्यक्षाभासादिषु
बाधितानुमानेषु च साधारणमिति कथं नोक्तदोषप्रसङ्गः ।
अन्यदस्तु सदात्मकं विशेषणम् प्रतियोगी त्वभावस्यासन्नेव तज्ज्ञानस्य विशेष्ये
व्यावृतबुद्ध्याधानाविरोधात् विशेषणं भवतीति चेत् !
अयुक्तमेतत्; विशिष्टं तावदभावस्य स्वरूपमिहोपात्तम् । तच्च विशेष्यमात्रशरीरं
न भवितुमर्हति; तथा सति विशेष्यस्वरूपमेवोच्यताम्, वृथा विशेषणपदोपन्यासः ?
तदनुपन्यासे चान्योन्याभाववत्त्वमात्रमुपन्यस्तं भवेत् । तच्च प्रत्यक्षाभासादेर्व्यव-
च्छेद्यस्यापि सङ्ग्राहकम् । ततश्च विशेष्यादन्योन्याभावादधिकं किञ्चिद्वक्तव्यं
तद्विशिष्टमुपन्यस्यताम् । स च यदि प्रतियोगी तदीयोऽभिधीयते, तर्हि तस्याभावा-
त्तदानीं विशिष्टाभावः प्रसक्तः । विशेष्यमात्रं परिशिष्टम्, तच्च केवलमतिप्रसक्तम् ।
प्रत्यक्षाभास से विशेषित है या उपलक्षित, जिसे प्रत्यक्षाभास में अप्रसक्त आप मानते हैं ।
प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, कारणप्रतियोगी से विशिष्ट अभाव कहीं नहीं रहता ।
अतः लक्षण में वैसा निवेश करने पर असम्भव हो जायगा । द्वितीय पक्ष में प्रत्यक्षाभास-
रूप उपलक्षण से उपलक्ष्य जो अन्योन्याभाव का एक स्वरूप है, वह प्रत्यक्षाभास और
बाधित अनुमान उभय-साधारण है। अतः प्रत्यक्षाभास में अतिव्याप्ति क्यों न हो ?
समर्थन—गुण, क्रिया आदि तो विद्यमान ही विशेषण होते हैं, किन्तु प्रतियोगी
अविद्यमान ही अभाव का विशेषण होता है । कारण विशेषण का ज्ञान विशेष्य में
इतरव्यावृत्तत्व-बुद्धि कर सकता है, इसमें कोई विरोध नहीं है ।
खंडन—यह कथन अयुक्त है, कारण यहाँ विशिष्ट अभाव का स्वरूप कहा
गया है। वह विशेष्यमात्र-शरीर नहीं हो सकता । कारण यदि विशेष्यमात्र ही
उसका शरीर हो तो उतना ही कहें, 'विशेषण' पद का उपन्यास व्यर्थ है । यदि
विशेषण का उपन्यास न कर विशेष्यमात्र का उपन्यास करें, तो अन्योन्याभावमात्र
का उपन्यास हुआ, वह व्यवच्छेद्य प्रत्यक्षाभास का भी संग्राहक हो जायगा । अतः विशेष्य
अन्योन्याभाव से अधिक कुछ कहना चाहिए। तब यद्विशिष्ट अभाव का उपन्यास
करेंगे, वह यदि प्रतियोगी है, तो उस लक्ष्य में प्रतियोगी का अभाव होने से विशिष्ट