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सर्वकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 39

परिच्छेद ] शून्यवाद-विचार २३
सत्त्वेऽस्त्यन्वयव्यतिरेकानुविधानं तस्य तज्जातीयस्य वा । त्वत्पक्षे तु असत्त्वा-
विशेषाद् व्यतिरेकः । परं सोऽप्यनियतः, यदा कारणाभावस्तदा कार्याभावा-
वश्यम्भावानभ्युपगमात्, नित्यासतः कारणस्यासत्त्व एव कदाचित्कार्योत्पादात् ।
अन्वयस्तु न क्वचिदपीति चेन्न । तुल्यत्वात् । अन्वयो नास्तीत्यभ्युपगच्छता-
ऽप्यन्वयोपगमात् । अन्वयस्यापि सत्तान्तर्भावने कथितदोषापत्तेः ।
एतेन—
‘आशामोदकतृप्ता ये ये चोपार्जितमोदकाः ।
रस-वीर्य-विपाकादि तुल्यं तेषां प्रसज्यते ॥’
सद्वाद-समर्थन—सत्त्व-पक्ष में दण्ड या दण्डजातीय के साथ घट का यह
अन्वय-व्यतिरेक है—‘जब दण्ड रहेगा, तब घट होगा और जब दण्ड का अभाव
होगा, तब घट का भी अभाव होगा।’ यही अन्वय-व्यतिरेक घट के प्रति ‘दण्ड कारण
है, रासभ नहीं’ इसमें नियामक है । तुम्हारे मत में केवल व्यतिरेक ( अभाव ) है और
वह भी नियत नहीं, क्योंकि जब ‘कारण का अभाव हो, तो कार्य का अभाव अवश्य
होगा’ ऐसा नहीं है, असत् कारण के अभाव में भी कभी कभी कार्य की उत्पत्ति देखी
जाती है । अन्वय तो कहीं भी नहीं है ।
खंडन—‘जहाँ दण्ड है, वहाँ घट है और जहाँ दण्डाभाव है, वहाँ घटाभाव है’
यह अन्वय-व्यतिरेक दोनों मतों में एक-सा है । क्योंकि असत्-वादी भी वस्तु को
स्वरूप-सत् ( प्रातिभासिक ) मानते ही हैं । यदि स्वरूप से भी सत् न मानें, तो उनके
मत में ‘असन् घट:’, ‘घटो न’ आदि व्यवहार ही न होगा । यह अलग बात है कि
प्रमाण से परमार्थतः दण्डादि सिद्ध नहीं होते, पर व्यवहार में तो हैं ही ।
किञ्च, ‘अन्वय नहीं है’ यह कहनेवाले तुम्हें भी अन्वय अवश्य मानना
पड़ेगा । क्योंकि यदि असत् का भी अन्वय न हो, तो निषेध किसका होगा ?
समर्थन—सत् अन्वय ही कार्य-कारण-भाव का नियामक है और असत्-पक्ष में
वह नहीं है । खंडन—तुम्हें ‘सत् अन्वय’ से क्या अभिप्रेत है—सत्ता से विशिष्ट
या उपलक्षित अन्वय कार्य-कारण-भाव का नियामक है ? दोनों पक्ष बन
नहीं सकते, कारण उक्त रीति से ( अन्तर्भावितसत्त्वं चेत्’ इस रीति से ) वे अयुक्त हैं ।
शङ्का—
‘आशा-मोदक विपणि के, मोदक से सममोद ।
चहिए तुम्हरे मलहि में, तुष्टि-पुष्टि अरु तोंद ॥’