खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
भवितव्यम् ; अन्यथा धर्मिणोर्विरुद्धधर्माध्यासप्रसङ्गात् । तत्रैकस्य व्यवच्छिद्य दोषा-
निश्चयात् प्रतिहेतावप्यसिद्ध्यादिदोषशङ्कायामापतितायाम् 'असिद्धादिहीनेने'ति-
लक्षणांशस्यानिश्चयात् लक्षणस्य दुरवधारणत्वम् ।
न च वाच्यं किमर्थं सत्प्रतिपक्षहेत्वोरन्यतरासिद्ध्यादिकमवश्यमभ्युपेयम्,
सत्प्रतिपक्षलक्षणदोषदुष्टत्वादेव तयोर्न धर्मिणोर्विरुद्धधर्माध्यस्तत्वमापत्स्यत इति ।
यतोऽवश्यं दुष्टे हेतौ व्याप्तेः पक्षधर्मताया वाऽभावेन भवितव्यम्, तत्सत्ताभ्युपगमे
साध्यसत्ताया अभ्युपगमप्रसङ्गात् ।
बाधादीनामप्युपाधिरुत्थापनद्वारा व्याप्त्यादिभङ्ग एव पर्यवसानात् ।
सत्प्रतिपक्षत्वादुन्नीयमानोऽपि व्याप्तिपक्षधर्मताभङ्गो न विशिष्यैकस्मिन् हेतौ
दोनों को सद्धेतु मानें तो ) धर्मी में दो विरुद्ध धर्म मानने पड़ेंगे । इस तरह उनके
मध्य एक में व्यवच्छेद्य असिद्ध्यादि दोषों का निश्चय होने पर प्रतिहेतु में भी असिद्धि
की शङ्का होगी ही । अतः 'असिद्ध्यादिहीनेन' यह अंश असिद्ध होने से प्रायः कहीं
भी लक्षण समन्वय नहीं होगा ।
समर्थन—सत्प्रतिपक्षित हेतुओं के मध्य किसी एक में असिद्ध्यादि दोष क्यों
माने जायँ ? सत्प्रतिपक्षरूप दोष होने से ही धर्मी में दो धर्मों के अध्यास की
आपत्ति न आयेगी । खण्डन—दुष्ट हेतु में व्याप्ति या पक्षधर्मता का अभाव अवश्य
रहता है, कारण यदि किसी हेतु में व्याप्ति और पक्षधर्मता दोनों मानें, तो साध्य की
सत्ता भी अवश्य माननी पड़ेगी । व्याप्य की सत्ता होने पर व्यापक की सत्ता अवश्य
माननी पड़ती है । एवञ्च सत्प्रतिपक्षमात्र से विरुद्धधर्माध्यास की आपत्ति से बच नहीं
सकते । अतः वहाँ भी असिद्ध्यादि मानने ही पड़ेंगे, तो पुनः असम्भव है, यह
भाव है ।
समर्थन—बाध में व्याप्ति और पक्षधर्मता के बीच किसी एक का भी भंग नहीं
होता, वह तो साक्षात् अनुमिति का प्रतिबन्धक है । खंडन—बाध का भी उपाधि
( पक्षेतरत्व आदि ) के बोधन द्वारा व्याप्तिभङ्ग में ही तात्पर्य है । व्याप्त्यादिभंग-
निरपेक्षतया दोषत्व नहीं है ।
समर्थन—जहाँ व्याप्ति-पक्षधर्मता अन्यतर के भंग का निश्चय होगा, तो हेतु
हीन-बल हो जायगा । तथाच वहाँ सत्प्रतिपक्ष कैसे हो सकेगा ? खंडन—सत्प्रतिपक्षत्व
से अनुमीयमान भी व्याप्तिपक्षधर्मता का अभाव किसी एक हेतु में विशेषरूप से
निश्चित नहीं किया जा सकता, और न उसकी आवश्यकता ही है । कारण अन्यतर