खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 361, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] सव्यभिचार-लक्षण का खण्डन ३४३
अथ ब्रूषे—असिद्धविरुद्धप्रकरणसमकालात्ययापदिष्टादन्यो हेत्वाभासोऽनैका-
न्तिक इति; तदप्युक्तन्यायेनैव निरस्तम् । किञ्च—एवमसिद्ध्यादिसङ्कीर्णस्य
अनैकान्तिकस्य न सङ्ग्रहः स्यात् ।
न च तदसिद्ध्यादित्वादेव अहेतुर्भविष्यतीति वाच्यम्; इतरानैकान्तिकवद्
विपक्षगतत्वादिनोद्भावने दोषत्वसम्भवात् ।
अथ मन्यसे—साधारणत्वासाधारणत्वयोर्व्यतिरेकाभ्यां मिलिताभ्यां विशिष्टा-
दन्यत्वं साधारणासाधारणानैकान्तिकव्यापि सामान्यलक्षणमस्तु ।
मैवम् ; यदि व्यतिरेकद्वयविशिष्टादन्यत्वम् , तर्हि तस्य विशिष्टस्य विशेष्ये
विशेषणे च इदमस्तीत्यव्याप्तिः । यदि व्यतिरेकद्वयवच्चोपलक्षणं तदोपलक्ष्य-
स्वरूपाणां यदि भेदेनैवोपलक्ष्यता तदा व्यतिरेकोऽप्यविशिष्टे तस्मिन्नस्ति । न हि
यदेवाविशिष्टं तन्मात्रं विशिष्टम् । एवमभेदेनापि ।
समर्थन—‘असिद्ध विरुद्ध, सत्प्रतिपक्ष और बाध से अन्य हेत्वाभास अनैकान्तिक
है' ऐसा कहेंगे । खण्डन—यह लक्षण भी हेत्वाभास-घटित होने से पूर्वोक्त प्रकार से
असङ्गत ही है। किञ्च—असिद्ध से सङ्कीर्ण अनैकान्तिक (‘शब्दोऽनित्यः चाक्षुषत्वात्’)
में असिद्ध से अन्यत्व न होने से अव्याप्ति हो जायगी ।
प्रश्न—यहाँ अनैकान्तिक का लक्षण समन्वित न हो, तो हानि क्या है ? असिद्ध
होने से ही वह अनुमिति का असाधक तो हो ही जायगा । उत्तर—शुद्ध अनैकान्तिक के
तुल्य असिद्धत्व से सङ्कीर्ण अनैकान्तिक भी विपक्षगतत्व रूप से ही जहाँ उद्भावित होता
है, वहाँ भी वह दोष कहलाता है । किन्तु अब उस रूप से दोष न कहलायेगा ।
समर्थन—'साधारणत्व और असाधारणत्व का जो अभाव तद्विशिष्ट से अन्य
अनैकान्तिक है' ऐसा कहेंगे । सद्धेतु और हेत्वाभासान्तर में तादृशाभावविशिष्टता ही
है, अतः वहाँ अतिव्याप्ति नहीं है । इसी तरह जहाँ अनैकान्तिक का सांकर्य है, उसका
भी संग्रह हो जायगा ।
खण्डन—अभावद्वय विशेषण है या उपलक्षण ? प्रथम पक्ष में व्यतिरेकद्वय-
विशिष्टान्य विशेषण ( व्यतिरेकद्वय ) तथा उसका विशेष्य ( सद्धेतु ) भी है, कारण
विशेषणमात्र या विशेष्यमात्र तादृश व्यतिरेक से विशिष्ट नहीं होते । अतः उनमें
अतिव्याप्ति हो जायगी । और उपलक्षण पक्ष में व्यतिरेकद्वय से उपलक्षित जो विशेष्य
( सद्धेतु आदि ) उससे अन्य विशिष्ट भी हुआ, कारण विशिष्ट और शुद्ध ( विशेष्य )
में भेद है । जो शुद्ध है, तन्मात्र ही विशिष्ट नहीं है ।