खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 324, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] अर्थापत्ति-लक्षण का खण्डनं ३०७
तर्कयोर्विरोधोऽपेक्षित इति चेन्न । मिथो विरोधेन तर्कयोरप्याभासत्वात् ।
विशेषप्रवृत्तप्रमाणार्थप्रतिक्षेपविषयत्वसंशयोऽविशेषप्रवृत्ततद्विपरीतार्थप्रमाणस्य
विरोध इति चेन्न । विशेषविषयप्रमाणबोधितवैपरीत्ये सति तद्विरुद्धार्थांशे संशयस्य
दुर्बलस्यानवकाशत्वेन अविशेषप्रवृत्तप्रमाणविषयतां तदीयां गोचरयितुमप्यसा-
मर्थ्यादेव ।
अविशेषप्रवृत्तस्य प्रमाणस्य तद्विपरीतार्थविशेषविषयप्रमाणदर्शनं तदितरविशेष-
विषयप्रमाफलं तथेति चेन्न । अविशेषप्रवृत्तस्य प्रमाणस्य तद्विपरीतार्थविशेष-
से एक के आभासत्व की कल्पना होती है, वैसे ही अर्थापत्ति-स्थल में भी विरोध से एक
का आभासत्व हो जायगा ।
समर्थन -- यहाँ 'विरोध' पद से तर्कों का विरोध विवक्षित है । अर्थात् ज्योतिषशास्त्र
से 'वर्षशतजीवी देवदत्तः' ऐसा ज्ञान होने पर 'यदि देवदत्तः क्वचित् न स्यात् तदा
वर्षशतजीवी न स्यात् , यदि देवदत्तः बहिर्न स्यात् तदा गेहनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगी
न स्यात्' इन दोनों तर्कों के 'क्वचित्' शब्द का गृहसत्त्व में पर्यवसान होने से विरोध
की अनुपपत्ति ही अर्थापत्ति है । खंडन - प्रमाणों की तरह तर्कों में भी विरोध नहीं
होता । यदि विरोध हो, तो वे तर्काभास हो जाते हैं । प्रकृत में अनुपलब्धि से बाधित
होने से क्वचित्त्व से प्रवृत्त तर्क का गृहसत्त्व में पर्यवसान नहीं हो सकता, अतः
विरोध नहीं है ।
समर्थन - 'सामान्यतः प्रवृत्त सत्त्वविषयक पूर्वजात सामान्यतो दृष्टरूप अनुमानप्रमाण-
धर्मिक तादृश संशय को ही अर्थापत्ति कहेंगे, जिसका विषय पश्चात् जात अनुपलब्धिरूप
प्रमाण के विषय गृहासत्त्व का अभाव (गृहसत्त्व) हो ।' अर्थात् 'देवदत्तः क्वचिदस्ति
वर्षशतजीवित्वात्, इत्यनुमितौ गृहसत्त्वविषयत्वमस्ति न वा' यह संशय अर्थापत्ति है ।
खंडन - 'देवदत्तो गेहे नास्ति' इस अनुपलब्धिरूप प्रमाण से गृहास व का बोध
(विशेष-दर्शन) होने पर गृहसत्त्व अंश के बोधन में दुर्बल संशय बाधित हो जाने से
उसमें सामान्यतः प्रवृत्त प्रमाण की विरुद्ध-अंशीय विषयता को विषय करने की सामर्थ्य
ही नहीं हो सकती । अर्थात् संशय विशेषादर्शनमूलक ही होता है । यहाँ जब
गृहासत्त्व का विशेषदर्शन हो गया, तो गृहसत्त्वविषयक संशय हो ही नहीं सकता ।
समर्थन -- 'सामान्यतः प्रवृत्त 'देवदत्तः क्वचिदस्ति वर्षशतजीवित्वात्' इस सामान्यतो
दृष्टरूप प्रमाण का तद्विषयविपरीतार्थ गृहासत्त्वविषयक अनुपलब्धिरूप प्रमाण का
दर्शन तदितरविषय बहिःसत्त्वप्रमा का जनक है और वही अर्थापत्ति है ।' खंडन -
प्रमाणों का विपरीतार्थत्वज्ञान उभय विषयों के सत्त्वासत्त्वरूप विरोध-गर्भ