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सर्वकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 319, कुल 610 में से

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पृष्ठ 319

किञ्च—‘देवदत्त + सु’ इत्यपि पदं स्यात् । अथ अपशब्दोऽयम्, पदत्वे सति
रुत्वादेर्विधानस्यावश्यम्भावित्वादिति चेन्न । यत एवायमपशब्दः, अत एव भवतो
दोषः प्रसज्यते—अपशब्देऽपि पदलक्षणं गतमिति । तस्मात् पाणिनिनाऽऽचार्येण
शब्दसिद्ध्यर्थं पदसंज्ञेयं रुत्वादिविध्यनुरोधेनापशब्ददशायामन्यैव कृता नदी-
संज्ञावत्, न लौकिकपदव्यवहारसिद्ध्यर्थम् । साधुशब्दविशेषे ततश्च तस्यान्यदेव
लक्षणं वाच्यम् । अन्यथा दाक्षीनन्दनोदीरितनदीसंज्ञाप्रत्यभिज्ञायां पाथः
प्रार्थयमानः काननस्थलीमलीकाभिमानी भवानीहेत ।
अथोच्यते—विभक्त्यन्तमेव सर्वलक्षणप्रवृत्त्या निष्पन्नं व्यावहारिकं पदमिति
लक्षणमस्तु । मैवम् ; सर्वलक्षणप्रवृत्तेः सर्वत्रासम्भवात् ।
सम्भवत्सर्वलक्षणप्रवृत्त्येति चेन्न । सम्भवत्त्वं तत्काले कालान्तरे वा विवक्षितम् ?
आद्ये ‘देवदत्त+रु’ इत्यपि पदं स्यात् रुत्वविधानकाले विसर्गस्यासम्भावितत्वात् ।
खण्डन — सब लक्ष्यों में एक अनुगत लक्षण न होने से प्रथम लक्षण की द्वितीय
लक्षणों के लक्ष्य में और द्वितीय की प्रथम लक्षण के लक्ष्य में अव्याप्ति हो जायगी ।
किञ्च —‘देवदत्त + सु’ यह भी पद हो जायगा, कारण यह भी विभक्त्यन्त है ।
समर्थन —यह अपशब्द या अशुद्ध शब्द है, अतएव ऐसा नहीं बोलते । किन्तु पद
तो है ही, कारण यदि यह पद न हो, तो रुत्व-विसर्ग कैसे होगा ? खण्डन —अपशब्द
है, इसीलिए तो दोष होता है कि अपशब्द में भी आपके पद-लक्षण की अतिव्याप्ति
हो जायगी । तस्मात् आचार्य पाणिनि ने शब्दसिद्धि के लिए रुत्व आदि विधियों के
अनुरोध से नदीसंज्ञा के तुल्य अपशब्द-साधारण पद का अन्य ही लक्षण किया
है । लौकिक पद-व्यवहार की सिद्धि के लिए केवल साधुशब्दविषयक लक्षण नहीं किया
है। अतः लौकिक पद का और ही लक्षण करना चाहिए । अन्यथा यदि पाणिनिकृत
लक्षण को लोकसाधारण मानें, तो दाक्षीनन्दनकृत नदीसंज्ञा का अनुसन्धानकर अलीक-
अभिमानी आप निर्जल काननस्थली को नदी मानकर जल के लिए उसे प्राप्त कीजिये ।
समर्थन —विभक्त्यन्त ही [ सब लक्षणों की प्रवृत्ति से निष्पन्न ] लौकिक पद
है । खंडन —सर्वत्र सब लक्षणों की प्रवृत्ति न होने से असम्भव हो जायगा ।
समर्थन —जिन-जिन लक्षणों की जहाँ-जहाँ प्रवृत्ति हो, उन सब लक्षणों से
निष्पन्न विभक्त्यन्त लौकिक पद है। खंडन —'उस काल में जिन-जिन लक्षणों की
प्रवृत्ति सम्भव हो', यह अर्थ है अथवा 'अन्य काल में भी जिन-जिन लक्षणों की प्रवृत्ति