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सर्वकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 244, कुल 610 में से

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पृष्ठ 244

परिच्छेद ] पञ्चम प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन २२७

किञ्च—यत्र निषेधस्तद्गतमैकरूप्यं निरूप्यम्, अन्यथा किमादाय नियमो
निरूप्येतेति कार्यगतैकरूप्यमनभिधाय न निस्तारः । विनाऽपि च नियमपदप्रवेशं
कार्यगतैकरूप्यमनिरूप्याऽनिस्तार एव । ज्ञायमानं नात्र करणमिति हि यदि
कार्यव्यक्तिमभिसन्धाय तदा तत्पूर्वं प्रतीतानां तत्राकारणत्वं दुरवधारणम् ।
ततस्तज्जातीये तज्जातीयव्यभिचारप्रतिसन्धानेऽवश्यं यतनीयमिति ।
अथाऽव्यवहितार्थप्रमात्वं तथा; तर्हि किमपेक्ष्याव्यवधानम्, किञ्च तदिति
वाच्यम् । इन्द्रियमपेक्ष्य तत्, असन्निकर्षश्च तदिति चेत्; तर्हीन्द्रियसन्निकृष्ट-
प्रकाशत्वमिति कुटिलिकार्थः । स चानुपपन्नः, स्वविलोचनगोलकानुमानव्याप्तेः ।
पञ्चम-प्रत्यक्षलक्षण-खण्डनम्
ज्ञानाजन्यज्ञानत्वं तदिति चेन्न । सविकल्पकविशेषाव्यापनात् ।
किञ्च--जिस प्रत्यक्षज्ञान के करण में ज्ञातत्व का निषेध आप करते हैं, उस
ज्ञान में जबतक ऐकरूप्य का ज्ञान न हो, तबतक किस धर्म को उद्देश्यत्ता का
अवच्छेदक मानकर निषेध करेंगे ? अतः प्रत्यक्षगत ऐकरूप्य के निरूपण के बिना उक्त
लक्षण का निर्वाह नहीं हो सकता । फिर ‘नियम’ पद का निवेश न करें, तो भी जबतक
ऐकरूप्य का ज्ञान न हो, तबतक 'जिस ज्ञान का करण अज्ञात हो, वह प्रत्यक्ष है' इस
लक्षण का भी निर्वाह नहीं हो सकता । कारण, यदि 'जिस प्रत्यक्ष व्यक्ति का करण ज्ञात
न हो वह प्रत्यक्ष है,' इस प्रकार व्यक्तिघटित लक्षण करें, तो इन्द्रिय की अनुमिति के
उत्तर होनेवाले घटादि-प्रत्यक्ष में अव्याप्ति हो जायगी । अतः आप ‘यद्-ज्ञानजातीय का
करणजातीय ज्ञात न हो' इसी प्रकार व्यभिचार ( प्रत्यक्ष के करण में ज्ञातत्व के निषेध )
का प्रतिसन्धान करेंगे । किन्तु वह प्रत्यक्षत्व-ज्ञान के बिना हो नहीं सकता ।
निर्वचन—'अव्यवहित जो अर्थ उसकी प्रमा, प्रत्यक्ष है।' खण्डन—इस लक्षण
में 'अव्यवधान' क्या वस्तु है और वह अव्यवधान किसकी अपेक्षा अभिप्रेत है ? यदि
इन्द्रिय की अपेक्षा अव्यवधान का ग्रहण करें और असन्निकर्ष को अव्यवधान कहें, तो
'इन्द्रियसन्निकृष्ट अर्थ का प्रकाश प्रत्यक्ष है,' यही इस कुटिलिका ( वक्रोक्ति ) का सरल
अर्थ हुआ । वह अपने लोचन के गोलक की अनुमिति में अतिव्याप्त होने से अयुक्त है ।
पञ्चम प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन
निर्वचन—‘ज्ञान से अजन्य ज्ञान प्रत्यक्ष है' ऐसा कहेंगे । खण्डन—'ज्ञान' पद से
यदि ज्ञानसामान्य का ग्रहण करें, तो निर्विकल्पक ज्ञान से जन्य होने से सविकल्पक
ज्ञानमात्र में अव्याप्ति हो जायगी । यदि सविकल्पक ज्ञान का ग्रहण करें, तो
भी अभाव आदि का ज्ञान सविकल्पक प्रतियोगिज्ञान से जन्य होता है । अतः
उसमें अव्याप्ति हो जायगी ।