खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] तृतीय प्रत्यक्ष-लक्षण का खंडन २२१
अथाननुगमान्न तदनुमा; तर्हि तदनुगतप्रतीत्याद्यनुपपत्तिः, व्यक्तेरनु-
मानादसिद्ध्यापत्तिश्च । यथा हि व्यक्तिं विना सामान्यस्य, तथा तावत् तं
विशेषं विना व्यक्तेरप्यनुपपत्यविशेषात् । यदि च प्रतीत्यपर्यवसानाभावात्
पक्षधर्मतया नानन्तविशेषसिद्धिरिति मन्यसे; तदा प्रतीतापर्यवसानात् तद्बुद्धिः
साक्षात्प्रकाशः स्यात् ।
अप्रतिपद्यमानानन्तविशेषप्रकाशकल्पनाच्च एकाकिसाक्षात्त्वनामकविशेष-
कल्पनैवाल्पत्वात् श्रेयसितरा । साक्षात्त्वव्यवहारान्यथानुपपत्तेः कल्पनाबीजस्य
तावताऽपि चरितार्थत्वादिति कृत्वा तत्कल्पनाऽपि नात एव । विस्तरश्चात्र वक्ष्यते ।
समर्थन—विशेष अनन्त हैं, उनमें एक अनुगत रूप नहीं है । अतः अनुमिति
में उनका भान नहीं होगा । खण्डन—यदि विशेष का अनुमिति में भान नहीं
होता, तो व्यापक विशेषविषयक 'अग्निमान् अयम्' इत्याकारक प्रतीति या व्यवहार भी
अनुपपन्न हो जायगा ।
किञ्च—अनुमान से व्यक्ति की सिद्धि भी नहीं होगी । यदि कहें कि व्यक्ति का
भान सामान्य के भान के बिना अनुपपन्न है, अतः सामान्यविषयक अनुमिति में व्यक्ति
भी भासती है, तो अविशेषात् तावद्-विशेष के बिना व्यक्ति भी अनुपपन्न ही है । इसलिए
व्यक्तिविषयक अनुमिति में तावद्-विशेष के भान का प्रसङ्ग हो जायगा । यदि कहें
कि विशेष के भान के बिना भी व्यक्ति का भान हो सकता है, अतः अनुपपत्ति के
न होने से अनुमिति में विशेष का भान नहीं होता, तब व्यक्ति भी विशेष के बिना
अनुपपन्न है; अतः व्यक्ति की अनुपपत्ति से विशेष की जो कल्पना है, वह विशेषविषयक
होने से प्रत्यक्ष हो जायगी ।
किञ्च—साक्षात्त्व-व्यवहार की उपपत्ति लाघवात् विषयनिष्ठ एक साक्षात्त्वधर्म की
कल्पना से ही सिद्ध है । फिर अनन्त विशेषों की कल्पना में कुछ भी प्रमाण नहीं है ।
समर्थन—विशेष की सिद्धि अप्रस्तुत है, अतः उसकी असिद्धि से कोई हानि
नहीं है । प्रस्तुत प्रत्यक्ष का लक्षण है, उसकी उपपत्ति साक्षात्त्व की कल्पना से हो
सकती है । खंडन—यदि आप प्रत्यक्षत्व-व्यवहार की अन्यथानुपपत्ति से अर्थगत
साक्षात्त्व की कल्पना या अनुमिति करें, तो वह कल्पना या अनुमिति साक्षात्त्वविषयक
होने से प्रत्यक्ष हो जायगी । किञ्च—अनिर्वचनीय साक्षात्त्व से ही साक्षात्-व्यवहार
की उपपत्ति हो जाती है, अतः अर्थगत वस्तुभूत साक्षात्त्व में कुछ प्रमाण भी नहीं है ।
इस विषय को विस्तार से आगे कहेंगे ।