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सर्वकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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परिच्छेद ] द्वितीय प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन २१५
अर्थादुत्थास्तनो धर्मा नानुमात्वादयो यथा ।
तद्धीत्वमपि तद्वत् स्यादित्यर्थोऽनर्थमाविशेत् ॥ ३७ ॥
सोऽपि वा धीविशेषः किं स्वीकार्यस्तद्धियं विना ।
एवञ्च सोऽपि सोऽपीति नान्तः सोपानधावने ॥ ३८ ॥
समस्तलोकशास्त्रैकमत्यमाश्रित्य नृत्यतोः ।
का तदस्तु गतिस्तत्तद्वस्तुधीव्यवहारयोः ॥ ३६ ॥
उपपादयितुं तैस्तैर्मतैरशकनीययोः ।
अनिर्वक्तव्यतावाद-पादसेवागतिस्तयोः ॥ ४० ॥
नापि द्वितीयः । तथा हि, अयमनुमानार्थः स्यात्— 'श्रावणादिप्रतिपत्तयः
प्रत्यक्षशब्दाभिधेयाः साक्षात्कारित्वादित्यादिः ।' सोऽपि न ; यद्यसाक्षात्कारिण्य-
समर्थन—ज्ञान का स्वभाव केवल प्रकाशरूप है । अतः तद्धीत्व ज्ञान का स्वाभाविक
धर्म नहीं है । किन्तु अर्थ के सम्बन्ध से औपाधिक है । जैसे—स्फटिक का लौहित्य ।
अतः ज्ञानगत विशेषधर्म के उत्पादन के लिए बाह्य अर्थ आवश्यक होने से बौद्धमत का
प्रवेश न होगा । खंडन—जैसे अनुमात्व आदि धर्म अर्थजन्य नहीं, किन्तु लिङ्गपरामर्श-
जन्य हैं, वैसे ही तदर्थबुद्धित्व भी अर्थजन्य नहीं, किन्तु अन्य जन्य ही है । अतः
बुद्धिधर्म के आधान के लिए बाह्य अर्थ का उपयोग नहीं है ॥ ३७ ॥
किञ्च—अतिप्रसङ्ग होने से प्रमामात्र से बुद्धिगत तद्बुद्धित्वरूप धर्म की सिद्धि भी
हो नहीं सकती, किन्तु तद्बुद्धित्वविशिष्ट प्रमा से ही होगी । अतः अंशतः आत्माश्रय
हो जायगा । इसी तरह तद्बुद्धित्व के भी तद्बुद्धिबुद्धित्वरूप धर्म की सिद्धि तद्बुद्धि
से ही होगी, अतः अनवस्था का प्रसङ्ग हो जायगा ॥ ३८ ॥
शंका—यदि बाह्य अर्थ या तद्बुद्धित्व की सिद्धि न हो, तो सम्पूर्ण लोक-शास्त्रमें
वर्तमान 'अयं घटः' इस बुद्धि या 'घटेन जलमाहरेयम्' इस व्यवहार की सिद्धि
कैसे होगी ? ॥ ३९ ॥
उत्तर—जब बाह्य पदार्थ के माननेवाले मतवादी बाह्य अर्थ का उपपादन नहीं कर
सकते, तब बाह्य पदार्थ सत् नहीं हैं । साथ ही प्रतीत होने से वे असत् भी नहीं हैं ।
किन्तु सत् और असत् से विलक्षण अनिर्वचनीय हैं, इससे अन्य गति नहीं ॥ ४० ॥
द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं है । कारण, द्वितीय कल्प में अनुमान का यह
स्वरूप होगा—'श्रावण आदि प्रमाएँ 'प्रत्यक्ष' शब्द से अभिधेय हैं, साक्षात्कारी होने
से; जो प्रत्यक्षशब्द का अभिधेय नहीं, वह साक्षात्कारी नहीं, जैसे—अनुमिति ।' किन्तु