खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 224, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] द्वितीय प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन २०७
चानुगतस्वरूपस्य निर्वक्तुमशक्यत्वात् । अन्यथा अन्यव्यक्तिविषयस्यान्यत्र
तथात्वापत्तेः ।
नापि द्वितीयः पक्षः ; विकल्पासहत्वात् । किं सम्प्रयोगापेक्षया वर्तमानत्वम् ,
अथ यत्किञ्चिदपेक्षया ? प्रथमे विशेषणत्वपक्षान्न विशेष इत्युक्तदोषापत्तिः ।
द्वितीये तु लटोऽविवक्षितार्थत्वमेव स्यात्, व्यवच्छेद्ययोर्भासितभासिष्यमाणयोरपि
तदा तदा भासमानत्वस्वीकारात् ।
इन्द्रियसम्प्रयोगानन्तरं भासमानत्वमपेक्षितम्, अतो विवक्षितार्थमिति चेन्न ।
आत्मनोऽपीन्द्रियसंयोगानन्तरं भासमानत्वमस्ति । न हि स यदा मनसा
गृह्यते तदा नेन्द्रियसंयोगानन्तरम् ।
जिससे उसे स्वस्वरूप से संग्रहकर 'स्व' शब्द को ज्ञानमात्र का वाच्य मानें । यदि
कथञ्चित् स्वत्व का निर्वचन भी करें, तो ज्ञानमात्र के 'स्व'शब्दवाच्य होने से
अन्यविषयक ज्ञान अन्य में, अर्थात् घटज्ञान आत्मा में प्रत्यक्ष हो जायगा ।
"भासमान' इस पद में 'लट्' का अर्थ विवक्षित है" यह द्वितीय कल्प भी
युक्त नहीं । कारण, वह विकल्प को सह नहीं सकता । देखिये—क्या सम्प्रयोग की
अपेक्षा वर्तमानत्व विवक्षित है अथवा जिस किसीकी अपेक्षा ? इनमें प्रथम पक्ष युक्त
नहीं, कारण सम्प्रयोग-काल में [ कारण के कार्य से पूर्ववर्ती होने से ] भासमानता
हो ही नहीं सकती । अतः इस पक्ष में भी विशेषण पक्ष में कथित दोष हो जायगा ।
यदि यत्किञ्चित् की अपेक्षा वर्तमानता का ग्रहण करें, तो अर्थतः वर्तमानत्व
अविवक्षित ही हुआ । कारण, भासिष्यमाण ( भासित होनेवाला ) और भासित
भी यदा कदाचित् वर्तमान भासन का विषय ही हैं। अतः उनका व्यवच्छेद
नहीं होगा ।
समर्थन—"इन्द्रिय-सम्प्रयोग के अनन्तर जायमान जो भासन तद्विषय आकार
और इन्द्रिय के सम्प्रयोग से जन्य ज्ञान प्रत्यक्ष है" ऐसा लक्षण करने पर घटज्ञान
आत्मा में प्रत्यक्ष नहीं होगा । कारण, चक्षुःसंयोग के अनन्तर आत्मा भासमान नहीं
है । खंडन—आत्मा का भासन भी मनोरूप इन्द्रिय के संयोग के अनन्तर ही
होता है, मनोरूप इन्द्रिय के संयोग के बिना आत्मा का ग्रहण भी नहीं होता ।
अतः उक्त रूप से परिष्कार करने पर भी घटज्ञान आत्मा में प्रत्यक्ष हो जायगा ।