खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
दुष्टेन्द्रियदशोत्पन्नतत्पीतमज्ञानाद्युल्लिखितविषयवैपरीत्यस्य अप्रमात्वप्रसङ्गाच्च ।
प्रमित्यानुल्लिखितार्थवैपरीत्यमात्रविवक्षायां तु प्रमाया एव लक्ष्यमाणत्त्वादि-
त्युक्तमनुषज्जति ।
अदुष्टकरणकज्ञानेनाबाधितत्वं विवक्षितमिति चेत् ; तदेव तर्हि प्रमालक्षणमस्तु ।
किञ्च—दुष्टत्वनिरूपणमन्तरेण अदुष्टत्वस्य दुर्निंरूपत्वात् ।
ननु किमेतावता ? दुष्टत्वं विपरीतज्ञानप्रयोजकस्तद्धेतुगतो विशेष इति
सुवचमेवेति । न; विपरीतपदव्यवच्छेद्याप्रमितौ तदुपादानवैयर्थ्यात् । तदनुपादाने
च ज्ञानजनकत्वमात्रं दुष्टत्वमिति अदुष्टकरणजं ज्ञानं नास्त्येवेति स्यात् ।
विपरीतपदव्यवच्छेद्या प्रमैवेति चेन्न । तस्या एव लक्ष्यमाणत्वात् । तदीय-
ज्ञान का भी पित्तरोग से दूषित दशा में उत्पन्न 'पीतः शंखः' इस ज्ञान से बाध
होने के कारण 'शुक्लः शंखः' यह ज्ञान भी प्रमा न होगा। यदि कहें कि जिस अनुभव
के विषय का अभाव प्रमा से उल्लिख्यमान न हो, वह अविसंवादी है, तो प्रमा से प्रमा
की निरुक्ति होने के कारण आत्माश्रय और प्रमा से अविसंवादित्व की तथा अविसंवादित्व
से प्रमा की निरुक्ति होने के कारण अन्योन्याश्रय हो जायगा ।
समर्थन—'अदुष्ट-इन्द्रियजन्य ज्ञान से जो ज्ञान बाधित न हो, वह अविसंवादी
है' ऐसा कहेंगे, तब तो 'शुक्लः शंखः' इस प्रमा में न अव्याप्ति है और न आत्माश्रय
ही है । खण्डन—फिर तो लाघव होने से 'अदुष्ट-इन्द्रियजन्य अनुभव' ही प्रमा का
लक्षण मानिये । किञ्च—जबतक दुष्टत्व की निरुक्ति न हो, तबतक अदुष्टत्व का
निरूपण भी असंभव ही है ।
समर्थन—विपरीत ज्ञान का प्रयोजक तथा हेतुगत विशेष को ही दोष कहा जा
सकता है । खण्डन—'विपरीत' पद के निवेश से किसका व्यवच्छेद होगा ? यदि
व्यवच्छेद्य की प्रतीति न हो, तो विपरीत पद का निवेश व्यर्थ ही हो जायगा । यदि
विपरीत पद का निवेश न करें, तो ज्ञानमात्रजनकत्व ही दुष्टत्व होगा । तब कोई भी
ज्ञान अदुष्ट इन्द्रियजन्य न होगा ।
समर्थन—'विपरीत' पद का व्यवच्छेद्य प्रमा ही है, अतः निवेश व्यर्थ नहीं है ।
खंडन—अभी तो प्रमा का लक्षण ही कर रहे हैं, अतः इतरव्यावृत्त रूप से उसका
स्वरूप-निर्धारित ही नहीं हुआ है। फिर उसका व्यवच्छेद कैसे होगा ? इसके
अतिरिक्त, इतर-व्यावृत्त प्रमा की प्रतीति के बिना लक्षण द्वारा इतरव्यावृत्त प्रमा की