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सर्वकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 170

परिच्छेद ] याथार्थ्य का खण्डन १५३
ननु साक्षाद्विशेषणत्वं विवक्षितम् । रजतत्वं तु ज्ञानद्वारा शुक्तिविशेषणमिति
नातिप्रसङ्गः । मैवम्, तर्हि 'दीर्घदण्डः पुरुषः' इत्यादौ ह्रस्वदण्डादिभ्यो वैलक्षण्ये
विशेष्यस्यानुभूयमाने अनुभूतेर्न प्रमात्वं स्यात्, दीर्घत्वादेर्दण्डादिद्वारा विशेषणत्वा-
दिति । ज्ञानरूपद्वारानपेक्षतया विशेषणत्वमिष्टमिति चेन्न । 'साक्षात्कृत' इत्याद्यव-
गमानामप्रमात्वापातात् ।
तज्ज्ञानप्रकाशितरूपेण विशेषणत्वमिष्टमिति तु दूरं तुच्छम् ; रूपादेः समवायेन
ज्ञानाविशेषकत्वात् ।
अर्थविशेषणत्वेऽयं नियमो यत्तज्ज्ञानप्रकाशितेन रूपेणेति, न तु ज्ञानेऽपीति
चेन्न । तज्ज्ञानव्यक्तेरन्यत्र असम्भवेनासाधारण्यात् अव्यापकत्वादित्यलम् ।
किञ्च—‘रजतत्वेन शुक्तिं जानामि' इस ज्ञान में रजतत्व भी शुक्ति का विशेषण
होता ही है। अतः 'इदं रजतम्' यह ज्ञान रजतत्व अंश में प्रमा होने से सर्वांश में भी
प्रमा हो जायगा ।
समर्थन—‘जिस ज्ञान का जो विषय अर्थ का साक्षात् विशेषण हो' इत्यादि
लक्षण करेंगे। एवञ्च उक्त ज्ञान में रजतत्व शुक्ति में साक्षात् विशेषण नहीं है, किन्तु
ज्ञान द्वारा विशेषण है; अतः अतिव्याप्ति नहीं है । खंडन—'दीर्घदण्डः पुरुषः' इस ज्ञान
के विशेष्य पुरुष में जहाँ ह्रस्वदण्ड से वैलक्षण्य अनुभूयमान है, वहाँ दीर्घत्व अंश में
प्रमात्व नहीं होगा, कारण दीर्घत्व दण्ड द्वारा पुरुष का विशेषण है, साक्षात् नहीं है ।
समर्थन—‘जिस ज्ञान का जो विषय ज्ञानरूप द्वार की अपेक्षा न कर अर्थ का
विशेषण हो' इत्यादि निवेश करेंगे, तो अतिप्रसंग नहीं होगा । खंडन—तब तो
‘साक्षात्कृतो घटः’ इस ज्ञान में साक्षात्त्व ज्ञान द्वारा घट में विशेषण होने से वह
ज्ञान भी अप्रमा हो जायगा ।
समर्थन—‘जिस ज्ञान का जो विषय तद्ज्ञानविषयत्व सम्बन्ध से विशेषण हो' ऐसा
कहें, तो कोई दोष न होगा। 'इदं रजतम्' इस ज्ञान का विषय रजतत्व समवाय
सम्बन्ध से शुक्ति में विशेषण नहीं है। खंडन—तब तो 'रूपवान् घटः' इस ज्ञान में
अव्याप्ति हो जायगी, क्योंकि वहाँ ज्ञान में रूप समवाय सम्बन्ध से विशेषण नहीं है।
यदि कहें कि 'ज्ञानविषयता संबन्ध से विशेषण हो' यह नियम अर्थ में विशेषण
के लिए है, ज्ञान में तो विषयता सम्बन्ध से ही विशेषण अभिप्रेत है, तथापि यह
लक्षण निर्दोष नहीं। कारण तब तो 'जिस ज्ञान का जो विषय तद्ज्ञानविषयतासंबन्ध से
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