खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 162, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ें[परिच्छेद ] तत्त्वानुभवत्व का खण्डन १४५
न च वक्तुः संशय एव, निश्चायकाभावात्; एकतरकोटिव्यवहारस्तु कृष्यादि-
प्रवृत्तिवदिति युक्तम् । तत्राप्याहाररूपैककोटिनिश्चयास्थानात् ; अन्यथा संशयस्य
कोटिद्वयनिश्चयसमुच्चयतापत्तेः ।
न च प्रमैव तदित्युरीकरणीयम् ; मध्येऽप्यक्षादिदुरन्तर्भावत्वात् ।
अव्यभिचारिकरणजन्यत्वे सतीति विशेषणीयमिति चेन्न । तत्त्वपदवैयर्थ्यापातात् ।
न च काकतालीयसंवादमपि ज्ञानं व्यभिचारिसाधारणकारणसामग्रीजन्यमास्थातु-
मीशिषे; व्यभिचारिणोऽपि कारणविशेषात् यथार्थत्वप्रसङ्गात् ।
न ह्यहेतुकमेवास्य यथार्थत्वम्; नियमाभावेन अतिप्रसङ्गापातात् । अवश्य-
मस्याव्यभिचारित्वे अव्यभिचारिनियतमेव करणं वक्तव्यम् ।
प्रश्न-- यहां वक्ता को सन्देहात्मक ही ज्ञान होता है, क्योंकि निश्चय की सामग्री
ही नहीं है । किन्तु सन्देहात्मक ज्ञान होने पर भी कृषि में प्रवृत्त मनुष्य के तुल्य
एक कोटि का व्यवहार हो सकता है। अर्थात् जैसे 'फलं भविष्यति न वा' ऐसा सन्देह
होने पर भी कृषक 'अवश्य फल होगा' इसी एक कोटि का व्यवहार करते हैं, वैसे
ही वराटक-स्थल में भी सन्देह होने पर एक कोटि का ही व्यवहार होगा । अतः अनुभूति
पद से उक्त ज्ञान का व्यवच्छेद क्यों न होगा ? उत्तर--कृषिस्थल में 'सहकारी वृष्टि
आदि होने पर फल अवश्य होगा' इत्याकारक ज्ञान होता है । यह उत्प्रेक्षारूप निश्चय
ही है, सन्देह नहीं । यदि निश्चय की तरह सन्देह भी व्यवहार का जनक हो, तो
उभयकोटिक सन्देह भी निश्चय ही हो जायगा । अथवा यदि एककोटिक उत्प्रेक्षा को
निश्चय मानें, तो उभयकोटिक सन्देह भी निश्चय हो जायगा ।
प्रश्न--'पञ्च वराटकाः' यह ज्ञान प्रमा है, ऐसा क्यों न स्वीकार करें ? उत्तर --यदि उसे
प्रमा मानेंगे, तो उसका प्रत्यक्ष आदि में अन्तर्भाव करना पड़ेगा, किन्तु वह हो नहीं सकता ।
प्रश्न--'तत्त्वानुभूतिः प्रमा' इस लक्षण में 'अव्यभिचारिकरणजन्यत्वे सति' यह
निवेश करेंगे । एवञ्च 'पञ्च वराटकाः' यह ज्ञान प्रमा नहीं कहलायेगा । उत्तर --ऐसा
निवेश करने पर 'तत्त्व'विशेषण व्यर्थ हो जायगा । किञ्च - काकतालीय यथार्थ ज्ञान को
भी व्यभिचारी करण से जन्य मानें, तो शुक्ति में रजतज्ञान भी यथार्थ कहा जायगा ।
प्रश्न--'पञ्च वराटकाः' यह ज्ञान अहेतुक ही क्यों न माना जाय ? उत्तर - ज्ञान
भावकार्य है, अतः वह अहेतुक नहीं हो सकता । फिर, ज्ञान की यथार्थता को भी
निर्हेतुक नहीं कह सकते । कारण यदि यथार्थता को निर्हेतुक मानें, तो भ्रम में भी
यथार्थता हो जायगी अथवा प्रमा भी अयथार्थ हो जायगी । यदि 'पञ्च वराटकाः' यह
ज्ञान अव्यभिचारी है, तो उसका कारण भी निश्चय ही अव्यभिचारी होना चाहिए ।
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