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सर्वकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 152, कुल 610 में से

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पृष्ठ 152

परिच्छेद ] भेद-संसर्गाभाव का भेद-खण्डन १३५
यदि तु तादात्म्यं नामाभेदाख्यो धर्मः कश्चिदिष्यते, स घटपटाद्यधिकरणतया
निषिध्यते; तदा संसर्गाभाव एव स स्यात् । तस्मात् निर्विशेषणतादात्म्यान्तर्भूतं
जगदिति कोट्यन्तराभाव इति ।
अपि च एवं तर्हि घटे निषिध्यमाने घटाभावो विधीयते, घटाभावे च
निषिध्यमाने घट इत्यपि न स्यात्; तृतीयस्य विद्यमानत्वात् । भवन् वा 'घटा-
भावः स्तम्भो न भवती'त्यत्रापि घटाभावत्वाविशेषात् विशेषान्तरानिर्वचनाच्च
घटः स्तम्भात्मेत्येवोक्तं स्यादिति त्वत्प्रसङ्गस्त्वयि निपतेत् । संसर्गान्योन्‍याभाव-
वैचित्र्यमादाय हि स परिहार्यः, स एव च नाद्यापि व्यवतिष्ठते ।
अत एव 'प्रतीतिबलादन्यदेव वैधर्म्यमनयोरुपेयमित्यपि निरस्तम् । प्रति-
समर्थन—अन्योन्याभाव का तादात्म्य प्रतियोगी है, अतः अन्योन्याभाव का
निषेध तादात्म्यरूप होगा । तादात्म्य जगत् का धर्म है, जगद्रूप नहीं । खंडन—यदि
तादात्म्य का घट में निषेध करें, तो अन्योन्याभाव का संसर्गाभाव में प्रवेश होने से
उसका उच्छेद हो जायगा । तस्मात् निर्विशेषण अन्योन्य अथवा तादात्म्य में
जगत् का प्रवेश होने से संसर्गाभाव अन्योन्याभावात्मक हो ही जायगा ।
किञ्च—यदि अन्योन्याभाव के अन्योन्याभाव को अन्योन्यरूप न मानें, तो घटा-
त्यन्ताभाव का अत्यन्ताभाव भी घटरूप न होगा; क्योंकि घट और घटाभाव से अन्य
तृतीय कोटि यहाँ भी नहीं है । यदि तृतीय कोटि के रहते भी अभाव के अभाव को
प्रतियोगीरूप मानें, तो 'घटाभावात्मा स्तम्भो न भवति' यहां घटान्योन्‍याभाव का अन्यो-
न्याभाव भी स्तम्भात्मा हो जायगा; क्योंकि अन्योन्याभाव भी अभाव ही है और आपने
अभीतक संसर्गाभाव से अन्योन्याभाव का भेद सिद्ध नहीं किया है । अतः 'अत्यन्ता-
भावस्थल में अभावाभाव प्रतियोगीरूप होता है और अन्योन्याभावस्थल में नहीं' यह
नियम मानकर भी अतिप्रसङ्ग का निवारण कर सकते हैं ।
समर्थन—किसी अभाव का अभाव प्रतियोगीरूप प्रतीत होता है, तो किसी
का प्रतियोगी से अन्य, अतः यह प्रतीति ही दोनों अभावों के भेद में प्रमाण है ।
खण्डन—जब तक लक्षण से अर्थ का भेद सिद्ध न हो, तबतक दोनों अभावों की
भेदावगाही प्रतीति प्रमा न होकर भ्रमरूप ही रहेगी । अतः इन दोनों अभावों की
भेदावगाही प्रतीति भी प्रमा नहीं ।
समर्थन—'जहां प्रतियोगी और अभाव दोनों में परस्पर विरोध हो, वहां अभाव का
निषेध प्रतियोगी की विधि के लिए होता है । अर्थात् अभावाभाव प्रतियोगीरूप होता