खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
तथापि तद्विलक्षणस्वभावत्वादुनयोरीदृशत्वमुपपद्यते । न हि एकस्य यादृक् पदार्थस्य
स्वभावस्तादृगन्यस्यापि सर्वस्य भवति, जगद्वैचित्र्यभङ्गप्रसङ्गादिति ।
नैतदस्ति । यत्र हि मिलितत्त्वं तयोस्तत्र किं परस्परसहकारित्वमनयोरेष्टव्यं न
वा ? न चेत्, परस्परमेलनकलक्षणो विशेषोऽनुपयोगी, कार्यजननं प्रति मिथः सह-
कारिभावविरहेणाप्रयोजकत्वात् । ततश्चाविशेषात् पृथगेव कार्यं प्रसज्येत । अथ पर-
स्परसहकारित्वं तयोरिष्यते; तदा अनुभवांशेऽपि संस्कारस्य व्यापारः, स्मरणांशे-
ऽप्यक्षस्येति नियामकत्वाभिमतयोस्तयोरुभयांशे साधारणत्वात् स्मृत्यंशेऽप्यनुभूतिरनु-
भूत्यंशेऽपि स्मरणमिति वज्रलेपायितं प्रत्यभिज्ञायामनुभूतिस्मृतिसङ्करेखेति ।
'नाऽप्यनुभव एवेति पक्षः; तथा सति तत्तावच्छिन्नस्यामेदाश्रयतायां न
संस्कारो नेन्द्रियसन्निकर्षश्चेति तद्विषयत्वापातः ।
नहीं करती; तथापि अनुभव और स्मृति की सामग्री का स्वभाव विलक्षण है । अतः वह
मिलकर चित्र-कार्य कर सकती है । क्योंकि एक वस्तु का जैसा स्वभाव है, वैसा ही
अन्य पदार्थों का नहीं होता । अन्यथा जगत् की विचित्रता न रह जायगी ।
खण्डनकर्ता—जहाँ स्मृति तथा अनुभव दोनों की सामग्रियाँ मिलती हैं, वहाँ उन
में परस्पर सहकारित्व है या नहीं ? यदि नहीं, तो चित्र-कार्य की उत्पत्ति में सामग्री-
सम्मेलनरूप विशेष अनुपयोगी होगा । क्योंकि परस्पर सहकार न होने से वह अप्र-
योजक है । फिर अप्रयोजक होने से अलग-अलग कार्य की आपत्ति होगी । यदि परस्पर
दोनों सामग्रियों में सहकार इष्ट हो, तो प्रत्यभिज्ञा के अनुभवांश में संस्कार का और
स्मरणांश में इन्द्रिय का व्यापार है, फलतः सामग्रि द्वयरूप नियामक के उभयांश-साधा-
रण होने से स्मृति-अंश में अनुभवत्व तथा अनुभव-अंश में स्मृतित्व है । इसलिए
प्रत्यभिज्ञा में स्मृतित्व और अनुभवत्व दोनों का सङ्कर वज्र-लेपसा स्थिर हो जायगा ।
'प्रत्यभिज्ञा अनुभव है' यह चरम पक्ष भी उचित नहीं है, क्योंकि प्रत्यभिज्ञा को
अनुभव मानने पर तत्तावच्छिन्न के अभेद में न संस्कार है और न इन्द्रिय का
सन्निकर्ष ही, अतः अभेद प्रत्यभिज्ञा का विषय नहीं होगा ।
प्रत्यभिज्ञानिरासः ।