खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
ज्ञानत्वं वा, स्मृतिलक्षणरहितज्ञानत्वं वा, तदविदूरप्राक्कालोत्पत्तिनियतासाधारण-
कारणकबुद्धित्वं वा ?
न तावदाद्यः। तथाहि—अनुभूतित्वं नाम जातिरेकाऽभ्युपगम्येति कुतः ?
'अनुभवामी'ति प्रत्ययानुगमवशादिति चेन्न । माघमासीय निशावसाने सिता-
सितसरित्सम्मेदस्नायिनः सत्यपि शब्दबलाद् भाविस्वकीयस्वर्गसुखसम्प्रत्यये
'सुखमनुभवामी'ति प्रतीत्यनुदयात्, प्रत्युत शीतसम्भूतवेदनासंवेदनादेव परस्त्रियञ्च
सम्भुञ्जानस्य आस्तिककामुकस्य शब्दाधीने सत्यपि भाविनरकगमनानुभवनीय-
यातनाधिगमे 'दुःखमनुभवामी'ति मतेरनुत्पत्तेः । प्रत्युत 'अमन्दमानन्दं संविदन्
साम्प्रतमस्मी'ति प्रत्ययात् ।
ज्ञानत्व है या स्मृतित्वाभाववत् ज्ञानत्व है अथवा स्व से 'अव्यवहित पूर्वक्षण में होनेवाली
उत्पत्ति से नियत (व्यापक) है असाधारण कारण जिसका, ऐसा बुद्धित्व है ?
इनमें प्रथम पक्ष (ज्ञानत्व-व्याप्य जाति) युक्त नहीं; क्योंकि अनुभूतित्व-जाति
में कोई प्रमाण नहीं है ।
निर्वचनकर्ता—प्रत्यक्ष, अनुमिति, उपमिति और शाब्द, इन चार प्रकार के ज्ञानों में
'अनुभवामि' इत्याकारक जो अनुगत प्रतीति होती है, वही अनुभूतित्वजाति में प्रमाण है ।
खण्डनकर्ता—माघमास में प्रातःकाल सिता (गङ्गा) और असिता (यमुना)
इन दो नदियों के सङ्गम में स्नानकर्ता पुरुष को 'सिताऽसिते सरिते यत्र सङ्गते,
तत्राऽऽप्लुतासो दिवमुत्पतन्ति' इत्यादि श्रुति-शब्दों से भाविस्वर्ग-सुखविषयक शाब्दज्ञान
होने पर भी उस ज्ञान में 'स्वर्गसुखमनुभवामि' ऐसी प्रतीति नहीं होती । प्रत्युत
शीतस्पर्श के त्वाच-प्रत्यक्ष से जन्य दुःखानुभव का 'दुःखमनुभवामि' इत्याकारक
अनुव्यवसाय ही होता है । इसी तरह परस्त्री के उपभोगकाल में आस्तिक कामुक
को 'न परस्त्रियं गच्छेत्' इस आप्त-वाक्य से भावी दुःख का शाब्दज्ञान होने पर भी
उसे 'दुःखमनुभवामि' ऐसा अनुभव नहीं होता, किन्तु 'पूर्ण सुख का
अनुभव करता हूँ' ऐसा ही अनुव्यवसाय होता है । अतः प्रत्यक्षादि में अनुगत अनुभवत्व-
जाति में कुछ प्रमाण नहीं है ।
१. प्रत्यक्ष, अनुमिति, उपमिति और शाब्दबोध के असाधारण कारण सन्निकर्ष, व्याप्ति-
ज्ञान आदि अपने-अपने कार्य से अव्यवहित पूर्वक्षण में उत्पन्न होते हैं । पर स्मृति का असाधारण
कारण संस्कार अपने कार्य (स्मृति) के अव्यवहित पूर्वक्षण में उत्पन्न नहीं होता ।