खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 102, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ें[२च्छेद ] प्रमा-लक्षण में तत्त्वपदार्थ-खण्डन ८७
अथ प्रमालक्षणे तत्त्वपदार्थखण्डनम्
तेषु तावत् 'तत्त्वानुभूतिः प्रमा' इत्यप्ययुक्तम्; तत्त्वशब्दार्थस्य निर्वक्तुमशक्य-
त्वात् । तस्य भावो हि तत्त्वमुच्यते, प्रकृतं च तच्छब्दार्थः । न चात्र प्रकृतं
किंचिदस्ति यत् तच्छब्देन परामृश्यते ।
अथ अनुभूत्या स्वसंबन्धिविषय आक्षेपाद् बुद्धिस्थः कार्यते, स तच्छब्देन
परामृश्यते, वक्तृश्रोतृबुद्धिस्थतायामेव प्रकरणपदार्थविश्रामात् । तेन यस्यार्थस्य
यो भावः, तत् तस्य तत्त्वमुच्यत इति ।
तो पूछा जायगा—'वह ज्ञानत्व ही क्या है ?' इसपर यदि 'सुखादि में अवृत्ति और
आत्मा के विशेषगुण में वृत्ति जाति-विशेष ज्ञानत्व है' यह उत्तर हो, तो फिर प्रश्न
होगा कि 'वह जाति ही क्या है ?' इसपर 'अनुगत-प्रत्यय ( एकाकारक ज्ञान )
का हेतु जाति है' यह उत्तर है । यहाँ ज्ञान की सिद्धि होने पर जाति की सिद्धि,
जाति की सिद्धि होने पर ज्ञानत्व की सिद्धि और ज्ञानत्व की सिद्धि होने पर ज्ञान
की सिद्धि—इस तरह चक्रक; ज्ञान की सिद्धि होने पर ज्ञानत्व की सिद्धि तथा ज्ञानत्व
की सिद्धि होने पर ज्ञान की सिद्धि—इस तरह अन्योन्याश्रय तथा ज्ञान की सिद्धि होने
पर ज्ञान की सिद्धि—इस तरह आत्माश्रय, ये तीनों दोष हो जायेंगे ।
किञ्च—लक्षण लक्ष्यरूपी अधिकरण में ज्ञात होने पर ही व्यवहार का साधक होता
है । यहाँ यह प्रश्न हो सकता है कि अधिकरण क्या है ? इसका उत्तर है—"इह'
इत्याकारक ज्ञान का विषय अधिकरण है ।" इस उत्तर के अनन्तर 'ज्ञान क्या है ?' इस
प्रश्न पर 'ज्ञानत्वयुक्त ज्ञान है' यह उत्तर है । इस उत्तर के अनन्तर 'ज्ञानत्व क्या
है ?' इस प्रश्न पर 'सुखादि में अवृत्ति तथा आत्मवृत्ति-विशेषगुणवृत्ति जाति-विशेष
ज्ञानत्व है' यह उत्तर है । इस उत्तर के अनन्तर 'आत्मा क्या है ?' इस प्रश्न पर 'ज्ञान
का अधिकरण आत्मा है' यह उत्तर होगा । इस रीति से एक लक्षण को दूसरे लक्षण
की अपेक्षा होने से चक्रक आदि दोष हो जायेंगे ।
प्रमा-लक्षण में 'तत्त्व'-पदार्थ-खण्डन
उन लक्षणों में प्रथम 'तत्त्वानुभूतिः प्रमा' यह लक्षण 'तत्त्व' शब्द के अर्थ का
निर्वचन न हो सकने से अयुक्त है । क्योंकि तत् के भाव को 'तत्त्व' कहते हैं । तत्शब्द
का अर्थ 'प्रकृत' है । 'तत्त्वानुभूतिः प्रमा' यह लक्षण न्यायाचार्य शिवादित्य मिश्रकृत 'लक्षण-
माला' का प्रथम लक्षण है । अतः यहाँ प्रकृत कोई है नहीं, जो तत्-शब्दसे परामृष्ट हो ।
निर्वचनकर्ता—अनुभव ( ज्ञान ) नियमतः सविषयक होता है, अतः अनुभव से