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सर्वकोश
काव्यप्रकाश (आचार्य मम्मट - सम्पूर्ण १० उल्लास सटीक)

काव्यप्रकाश (आचार्य मम्मट - सम्पूर्ण १० उल्लास सटीक)

Kavyaprakasha of Mammata with Hindi Commentary

आचार्य मम्मट / पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि द्वारा

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 601

XLIV KĀVYAPRAKĀŚA
ह० ना० V. 7; प्रतिहारेन्दुराज on
उद्भट, P. 86; कु० व० जी० I. 42;
P. 30; श्र० वृ० मा० P. 11.
५७९ स्पष्टोल्लसत्किरण र० ह० वि० XIX. 1; म० व्य० वि०;
गो० का० प्र० P. 394.
६०१ स्पृशति तिग्मरुचौ र० ह० वि० III. 37; गो० का० प्र०
P. 401; सु० र० भा० 336/38.
२२१ स्फटिकाकृतिनिर्मलः गो० का० प्र० P. 210.
५६१ स्फुरदद्भुतरूपमुत्प्रताप श्री० का० प० 315; गो० का० प्र०
P. 386; सु० र० भा० 104/89.
१६० स्रस्तां नितम्बादव का० कु० सं० III. 55; गो० का० प्र०
P. 182; सु० र० भा० 268/381.
४ स्वच्छन्दोच्छलदच्छ गो० का० प्र० P. 15; सु० र० भा०
9/131.
४७० स्वच्छात्मतागुणसमु गो० का० प्र० P. 348.
२६१ स्वपिति यावदयं निकटे श्री० का० प० 130; गो० का० प्र०
P. 237.
३९२ स्वप्नेऽपि समरेषु त्वां गो० का० प्र० P. 311.
३७७ स्वयं च पल्लवाताम्र उ० का० श्र० सा० सं० IV. 15; गो०
का० प्र० P. 298.
६०२ स्वयं च पल्लवाताम्र उ० का० श्र० सा० सं० IV. 15; गो०
का० प्र० P. 402.
३४६ स्वर्गप्राप्तिरनेनैव
२८५ हन्तुमेव प्रवृत्तस्य भा० का० श्र० I. 41.
४६ हरत्यघं संप्रति हेतु मा० शि० व० I. 26; गो० का० प्र०
P. 91.
४६८ हरवन्न विषमदृष्टिः श्री० का० प० 256.
११९ हरस्तु किंचित्परिवृत्त का० कु० सं० III. 67; श्री० का० प० 70.
५२७ हंसाणं सरेहिं सिरी हा० गा० स० 953; गो० का० प्र०
P. 372.
१४९ हा धिक् सा किल गो० का० प्र० P. 179.
२१९ हा नृप हा बुध हा कवि गो० का० प्र० P. 210.