काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३।५६] १. यमकके विशिष्ट भेद : (२) समुद्ग ६६
(२.३) कलापिनां चारुतयोपयान्ति वृन्दानिलापोढघनागमानाम् ।
वृन्दानि लापोढघनागमानां कलापिनां चारुतयोपयान्ति ॥ ५६ ॥
(२.३) लापों (केकाओं) के द्वारा बादलोंकी व्याप्ति सूचित करने वाले
मयूरोंकी केकाएँ तथा समूह जा रहे हैं । लाप (कलरव) के द्वारा मेघोंके
गमन (प्राप्ति) के विपरीत भाव अर्थात् उनके विनाशके सूचक जलमें बोलने
वालों (हंस, कारण्डरव, बतखु आदि पक्षियों) के झुण्ड सुन्दरतासे आ रहे
हैं ॥ ५६ ॥
प्रथम पादकी द्वितीय पादमें और (२) तृतीय पादकी चतुर्थ पादमें—हुई हैं,
में इसलिये यहाँ अव्यपेत द्विपाद यमक है । रुद्रटने (i) प्रथम पादकी द्वितीय
पादसे आवृत्तिमें 'मुख', (ii) तृतीयकी चतुर्थमें आवृत्तिसे 'पुच्छ' एवम् (iii)
इन दोनोंके युगपत् प्रयोगसे 'युग्मक' यमक माना है ।¹ रुद्रटने दण्डीके ही
भेदोंको पृथक्-पृथक् सञ्ज्ञाएँ देकर व्यवस्थित किया है । किसी नवीन प्रकार
की उद्भावना नहीं की है ॥ ५५ ॥
(२.३) प्रथम-चतुर्थ व्यपेत, द्वितीय-तृतीय अव्यपेत समुद्ग यमक—इस
श्लोकमें कविने 'बरखा बिगत, शरद ऋतु आई' का व्यञ्जक वर्णन किया है ।
यदि इसी वर्णविन्यासको केवल एक अर्धालीके रूपमें कहा जाता, तो
यहाँ भिन्नपद (शब्द-) श्लेष होता । श्लिष्ट पदोंको आवृत्तिसे पृथक्-पृथक्
कहनेसे श्लेषका क्षेत्र नहीं रहा, यमकका निष्पन्न हो गया । यहाँ प्रथम
पादके और चतुर्थ पादके मध्य दो पाद हैं, अतः व्यपेत यमक है । द्वितीय पाद
की तृतीय पादमें आवृत्ति निरन्तरतासे हुई है, अतः अव्यपेत यमक है । एक
श्लोकमें दोनों सम्पन्न होनेसे यह उभयात्मक यमक है ।
वादी जी और तरुण वाचस्पतिने मयूरोंके चारुतासे उपयान (आगमन)
तथा हंसोंकी आरुतियोंके अपयान (प्रयाण) के रूपमें व्याख्या की है । यह
प्राकृत क्रमके विपरीत होनेके कारण उचित नहीं है : शरद् ऋतु होनेपर हंसों
का भारतमें आगमन तथा वसन्तागमनपर यहाँसे प्रयाण होता है । मयूरोंकी
केकाएँ वर्षाकालमें प्रस्फुटित होती हैं तथा वर्षाकालकी समाप्तिके साथ शरदके
१. (i) पर्यायेणान्येषाम आवृत्तानां सहादिपादेन ।
मुख-सन्दंशावृतयः क्रमेण यमकानि जायन्ते ॥ काव्याल० ३।३
(ii) अन्योन्यं पश्चिमयोरावृत्त्या पादयोर्भवेत्पुच्छः । १०
(iii) मुख-पुच्छयोश्च योगाद् युग्मकमिति पादजं नवमम् ॥ १३