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सर्वकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 83, कुल 270 में से

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पृष्ठ 83

६० काव्यादर्श [३।४६
अधिक सर्वत्रसमभाव दृष्टि बताई है । यहाँ ‘अताम्यतः’ पद ‘काङ्क्षा’ और
‘ग्लानि’ अर्थ वाली √तम्'से' शतृ, नञ् तत्पुरुषसे पुं०, षष्ठी ए०व०में निष्पन्न
है । अतः इसका सम्बन्ध 'उत्तमता-विलोमताम्' से केवल 'काङ्क्षा' अर्थमें
होगा । 'ग्लानि' अकर्मक क्रिया है । अतः इस अर्थमें यह स्वतन्त्र ही रहेगा ।
ग्लान्यर्थक यह पद समतासे अपेक्षित प्रतिद्वन्द्वी 'हर्ष' का भी उपलक्षक है ।
'अताम्यतः' की ग्लान्यर्थतामें द्वितीयान्त पदका सम्बन्ध या तो निकटस्थ 'अ-
यती' (अगच्छन्ती) से होगा, या 'धुनाना' से । यह अन्तर्हितण्यर्थक 'कम्पन'
अर्थमें क्र्यादि गणमें पठित है : धूञ् कम्पने । इससे कर्तरि शानच्, स्त्री०
प्रथमा ए० व० में 'धुनाना' निष्पन्न है । अयति—√इ (भ्वा०२) कर्तरि लट्,
प्रथम ए० व० ।
यहाँ सजातीय वर्णसमुदाय 'मता' चारों पादोंके आदि, मध्य और अन्त
में नियताक्षर सङ्ख्याके बाद आवृत्त है । अतः सजातीय चतुष्पादाद्यन्त व्यपेत
त्रिस्थान यमक है । पादान्तमें पठित सजातीय 'मता' वर्णसमुदायकी आवृत्ति
अगले पादके आदिमें बिना व्यवधानके होनेसे यहाँ सजातीय चतुष्पादान्तादि
द्विस्थान यमक है । ये दोनों परस्पर सङ्कीर्ण हैं ।
सभी प्राचीन टीकाकारोंने यहाँ व्यपेत यमक माना है । पर अव्यपेत
आवृत्तिका अपलाप करना अशक्य है । भोजराजने इस विशेषताको अन्य भेद
व्यपेतका उच्छेद न करते हुए सूक्ष्म अव्यपेत भेद बताया है ।३ आचार्य दण्डीने
भी ५१ वें श्लोकमें इन वैचित्र्य-प्रकारोंको 'उक्तान्तर्गत सन्दष्टयमक' कहा
है । अतः ये विशेष उपेक्षणीय नहीं हैं ।
रत्नेश्वर मिश्रने इस श्लोकमें वृत्तका औचित्य बहुत महत्त्वपूर्ण बताया
है४ ॥ ४६ ॥
१. आख्यातचन्द्रिका ३।३।१७४ : अथ ग्लानौ च ताम्यति ।। ११७ ।।
काङ्क्षायामपि ।
२. सिद्धान्तकौमुदी, भ्वादि ६।२६-३१ : इट किट कटी गतौ ।...केचित्तु...
अन्ते च '√इ + √ई' इति प्रश्लिष्य 'अयति, इयाय, इयतुः....' इत्या-
युदाहरन्ति । भवतोषिणी, पृष्ठ ३३३ देखें ।
३. सरस्वतीकण्ठाभरण २।१२६ (उदाहरण) : अन्यभेदानुच्छेदेन सूक्ष्मं
यथा—'मतां धुनाना...न वामता ।।' अत्र 'व्यपेतानुच्छेदेनैव पादसन्धि-
ष्वव्यपेतमुत्पद्यते' इत्यस्थान-यमकमिदं सूक्ष्मावृत्तेः 'सन्धिसूक्ष्माव्यपेतम्'
उच्यते ।
४. रत्नदर्पण २।१२६ : अत्रापि वृत्तौचिती सर्वस्वायते ।