काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
पृष्ठ 81, कुल 270 में से
संदर्भ में पढ़ें५८ काव्यादर्श [३।४८
१०. मयामयालम्ब्ध'-कलामयाम-यामयामयातव्यविरामयामया ।
मयामयार्तिं निशयाम, यामयामयामसूं करुणामयामया२ ॥ ४८ ॥
१०. मानरहित (अत्यन्त दीर्घ) यामों (प्रहरों) वाली, नियन्त्रित करने
वाली निशासे मरणान्तक आमय (प्रेमरोग) की पीडाको प्राप्त हुआ हूँ । हे
जाने योग्य स्थानोंमें विराम (निषेध) से रहित, करुणामय (मेरे मित्र),
आमय (रोग) को प्राप्त मुझसे क्षय और उसके विपरीत (वृद्धि) के द्वारा
आलम्बन किये जाने वाले कलानिधि (चन्द्र) से आमय (कष्ट) पाने वाली
उस (प्रिया) को मिला दे ॥ ४८ ॥
अर्थोंमें तुदादि और रुधादि गणोंमें है ।४ अवेत — अव + √ इ (गतौ) कर्तरि
लोट्, परस्मैपद, मध्यम, बहु० वचन । हरेः पुरः — पुरस्, पुरतस् आदि
'अतस्' प्रत्ययार्थक प्रत्ययोंसे निष्पन्न शब्दोंके योगमें (युक्त शब्दमें) षष्ठी
होती है । अवेः तुल्यम् — तुल्यार्थक पदोंके योगमें उपमानमें तृतीया या षष्ठीका
विकल्प है ।५ अतः 'हरेः' में षष्ठी है ॥ ४७ ॥
१०. (३. घ.) पादाद्यन्त तथा अन्तादि चतुष्पाद अव्यपेत-व्यपेत सजातीय
यमक — अत्यन्त दुष्कर इस रचनामें कविने क्या कहना चाहा है, यह निश्चित
रूपसे तो वही जानते हैं । व्याख्याताओंने अपने-अपने अभिप्रायसे व्याकरणकी
लाठीसे इसे हाँककर जो चाहा है, वह कहलाया है । ऊपर किया अनुवाद भी
इसी दिशामें एक कदम है : न मा-मानं येषां ते अमाः इयत्ता-रहिताः, तादृशाः
यामाः प्रहरा यस्याः, तया अम-यामया; यमनं यामः, सोऽस्त्यस्या इति यामा,
तया यामया, निशया रात्र्या; मिनोति हिनस्ति इति मयः मरणकारीति
यावत्, स चासौ आमयो रोगः प्रेमाधिरूपो मयामग्रः, तस्य अर्तिः पीडा, तां
मयामयार्तिम् प्राणान्तकारिप्रेमरोगपीडामित्यर्थः; अयाम् प्रयातोऽहम् । अस्यां
१. तरुण० : लङ्घ्य । वादीजीने 'लङ्घ्य', 'लम्ब्य' में विकल्प बताया है ।
रत्नश्रीमें 'लम्ब्य' ही धृत और व्याख्यात है ।
२. वादीटीकामें 'मयाम्' व्याख्यात है ।
३. अन्वयः — अम-यामया यामया निशया मयामयार्तिम् अयाम् । अ-यातव्य-
विराम, करुणामय, आम-या मया मयामयालम्ब्य-कला-मया-मयाम्
अमूम् आमय ।
४. ओविजी भयचलनयोः (तुदादि ६, रुधादि २०) ।
५. अष्टाध्यायी २।३।३० : षष्ठ्यतसर्थप्रत्ययेन । ७२ : तुल्यार्थैरतुलोपमाभ्यां
तृतीयाऽन्यतरस्याम् ।