काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६ काव्यादर्श [३।४६
८. नयानयालोचनयानयानयानयानया१न्धान्विनयानयायते ।
न यानयासी२र्जिनयानया३नयानयानयास्त्वं जनयानयाश्रितान् ॥ ४६ ॥
८. हे अचल भविष्य वाले, अय (मार्ग) और अनय (कुमार्ग) के
विषयमें अन्धे (विवेकरहित), नीतिविरोधी लोगोंको नीति और अनीति
की इस आलोचना (दृष्टि) से विनीत करो । जिनपर तुम नहीं चले हो,
(उन) मार्गोंपर बुद्ध या महावीरके मार्गसे गमन करने वाले, बिना यानके
(पैदल) चलने वाले तुम (उन्हें) नीतिपर भलीभाँति आश्रित बनाओ ॥४६॥
आनन्दातिरेकसूचक आठ प्रकारके विरुत अभिप्रेत हैं ।५ इस पाठमें चतुष्पा-
दादिमध्यवर्ती सजातीय व्यपेत यमक है । अन्यविध व्याख्याओंके लिये रत्नश्री
आदि देखें ॥ ४५ ॥
८ (३. घ. ५.) अव्यपेत-व्यपेत चतुष्पादाद्यन्तवर्ती सजातीय यमक—इस
श्लोककी रत्नश्रीज्ञान, वादी जङ्घालदेव और तरुण वाचस्पतिने भिन्न-भिन्न
प्रकारकी व्याख्यायें की हैं । रत्नश्रीज्ञान और तरुणवाचस्पतिके फलितार्थमें
काफी कुछ समानता है । वादीजीने दो प्रकारसे व्याख्या की है ।
सजातीय वर्णसमुदाय 'नया' की निरन्तर तथा 'नयानया' की व्यवहित
आवृत्ति चारों पादोंके आदि और अन्तमें की गई है । प्रथम और तृतीय पादके
रत्नश्रीसम्मत पाठमें तीन बार प्रयुक्त 'नया' ('नयानयानया') की अन्य
१. यह रत्नश्रीसम्मत पाठ है । वादी : कृतीन्, तरुणा० : कृतीन् ।
२. यह रत्नश्री-वादिसम्मत पाठ है । तरुण० : यान्नरा० ।
३. यह रत्नश्रीसंमत पाठ है । वादि-तरुण० : नयांस्तान् ।
४. अन्वयः—अ-नयायते, अयानयान्धान् अनयान् अनया नयानयालोचनया
विनय । यान् न अयासीः, (तान्) नयान् जिन-यान-याः अ-यान-याः
त्वम् आनयाश्रितान् जनय । तरुणवाचस्पति : विनयानयायते, कृतीन्
यान् अनया नयानयालोचनया न अयासीः, अयानयान्धान्, अयानयान्
तान् जिन-यान-यान् जनय । आश्रितान् आनय ।
५. कामसूत्र २।८।८ : (१) गात्राणां संसनं, (२) नेत्रनिमीलनं, (३)
व्रीडानाशः, (४) समधिका च रतियोजनेति स्त्रीणां भावलक्षणम् ।
२।७।४-७ : तदुद्भवं च सीत्कृतम् तस्याऽितिरूपत्वात् तदनेकविधम् । विरु-
तानि चाष्टौ । हिङ्कार-स्तनित-कूजित-रुदित-सूत्कृत-दूत्कृत-फूत्कृतानि ।
अम्बाऽर्थाः शब्दा, वारणार्था, मोक्षणार्थाश्चालमर्थाः । ते चार्थयोगात् ।