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सर्वकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 270 में से

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पृष्ठ 76

३।४४] दुष्कर यमक ५३
अंश है विभुकी नामावलीका । उसका कोई प्रतिमान ही नहीं है जगत्में । १
उसके स्वरूपकी ईदृक्ता या इयत्ताका मान किस प्रतिमानसे किया जा सकता
है । २ हे हृदय, तू उसके आगे विनत हो । अपना आपा उँडेल दे उसीमें । तत्
त्वमसि । तू वही है । वही हो जा ।
अन्यविध अर्थोंके लिये रत्नश्री, वादि और तरुण टीकाएँ देखें । रत्नश्रीमें
तृतीय पादमें ‘आनयति’ के स्थानमें ‘आनमत’ पाठभेद बताया है । वादीटीका
और तरुणटीकामें उसीकी व्याख्या की है । इस पाठमें चतुर्थपादके मध्यमें ‘आन-
मतम्’ पदच्छेद इन लोगोंने किया है : आननन्ति = सम्यक् श्वासोच्छ्वासौ
कुर्वन्ति इति ‘आनाः’ प्राणिनः । तैः ३ मतः इति ‘आन-मतः’, तम् । अर्थात्
सभी प्राणी जिसे बहुत मानते हैं, उसे आ-नमत भली भाँती प्रणाम करो ।
आ + √ नम् कर्तरि लोट्, मध्यम बहुवचन । आ-नम—आ + √ नम् कर्तरि
लोट्, मध्यम एकवचन ।
यहाँ समान वर्णसमुदाय ‘मान’ की चारों पादोंके आदिमें एकेक अक्षरके
बाद तथा अन्तमें अव्यपेत आवृत्ति है । ‘मान-मान’ समुदायकी भी इसी तरह
चारों पादोंके आरम्भमें एकेक अक्षरके बाद और अन्तमें व्यवधानसे आवृत्ति
है । इसलिये यहाँ चतुष्पाद आद्यन्त-यमक है । आवृत्त वर्णसमुदायके समान
होनेसे यह सजातीय है ।
रत्नश्रीज्ञान, वादीजी, तरुणवाचस्पति और रङ्गाचार्य रेड्डीने एकेक
अक्षरको छोड़नेके बाद स्थित वर्णसमुदायकी आवृत्तिके कारण इसे आदिके
स्थानपर मध्य स्थान मानकर ‘मध्यान्तयमक’ का उदाहरण माना है । पर
सोलह अक्षर वाले पादमें प्रारम्भिक एक अक्षरको छोड़कर दो अक्षरोंकी
आवृत्तिसे ‘पादका मध्य’ कैसे हो गया ? चार अक्षरोंके बाद यदि होता, या
मध्यके निकट भी होता, तो ‘मध्य’ कहना उचित होता ।
१. न तस्य प्रतिमा अस्ति, यस्य नाम महत् यशः ।। वा० सं० ३२।३
२. विष्णोरिवास्यानवधारणीयमीदृक्तया रूपमियत्तया वा ।। रघुवंश १३।३
३. रत्नश्रीज्ञान और तरुण वाचस्पतिने ‘तेषां मतः’ विग्रह दिया है । पर
‘क्तेन च पूजायाम्’ (अष्टाध्यायी २।२।१२) से षष्ठीसमासनिषेधके
कारण यह उचित नहीं है । अतः ‘मत’ में √ मन् से ‘मति-बुद्धि-पूजा-
ऽर्थेभ्यश्च’ (अष्टाध्यायी ३।२।१८८) से वर्तमानमें क्त न करके भूत-
कालमें ‘निष्ठा’ (अष्टाध्यायी ३।२।१०२) से क्त करके तृतीया तत्पुरुष
उचित है । वादीटीका देखें ।