काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ काव्यादर्श [३।२८
२४. पातु वो भगवान् विष्णुः सदा नवघनद्युतिः ।
स दानवकुलध्वंसी सदान-वर-दन्ति-हा ॥ २८ ॥
२४. नवीन मेघके समान कान्ति (श्याम वर्ण) वाले, दानवोंके खानदानों
को नष्ट करने वाले, मदजलसहित श्रेष्ठ हस्तीको मारने वाले वे (जगत्-
प्रसिद्ध) षड्विध ऐश्वर्यसे सम्पन्न² विष्णु तुम्हारी रक्षा सदा करें ॥ २८ ॥
इसका प्रयोग ‘रजस्’, ‘धूलि’के लिये भी शास्त्रसम्मत है ।¹
यहाँ तीनों ‘परागत’में से कोई भी सार्थक शब्द या पद नहीं है । द्वितीय
‘परागत’ भी ‘परागतम्’ पदका एकदेश (अवयव) ही है; सम्पूर्ण अवयवी
नहीं । अतः ‘अर्थभिन्न वर्णों, शब्दों या पदोंकी आवृत्ति’ वाला लक्षण इस
प्रकारके उदाहरणोंपर ‘अर्थे सति’ परिष्कार होने तक लागू नहीं होता था ।
जबकि दण्डीका ‘वर्णसंहतिकी आवृत्ति’ वाला लक्षण सदा सर्वत्र अबाधित
है ॥ २७ ॥
२४. (२. ग. ३.) द्वि-तृतीय-चतुर्थ व्यपेत त्रिपादादि सुकर यमक—इस
उदाहरणमें भगवान् विष्णुके प्रति कविकी रति उनसे श्रोताओंकी रक्षाकी
आसीसके साथ व्यक्त की गई है । इन दोनोंमें आशीः (दण्डी २।३५५के
मतमें एतन्नामक अलङ्कार) ‘पातु’-शब्दोक्त होनेसे मुख्य है । रति इसकी
सिद्धिका अङ्ग बन गई है । यहाँ चार अक्षरोंके समुदाय (सदानव) की
आवृत्ति दूसरे, तीसरे और चौथे पादोंके आदिमें चार-चार अक्षरोंके व्यवधान
से हुई है । किन्तु अर्थावबोधमें तनिक भी क्लेश नहीं होता । अतः यहाँ
त्रिपादादि व्यपेत यमक और सुकर है । ‘स-दान-वर दन्ती’से ‘कुवलयापीड’
नामक गज अभिप्रेत है, जिसे विष्णुने कृष्णावतारमें कंसवधसे पहले यमधाम
पठाया था ।³ विधेय क्रियापद ‘पातु’का सबसे पहले प्रयोग आशीःपर बल देने
को किया है ॥ २८ ॥
१. अमरकोष २।४।१७ : परागः सुमनोरजः । ३।३।२१ : परागः कौसुमे
रेणौ, स्नानीयादौ, रजस्यपि ।
२. ऐश्वर्यस्य समग्रस्य, वीर्यस्य, यशसः, श्रियः ।
ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां ‘भग’ इतीङ्गना ॥
३. हरिवंशपुराण, विष्णुपर्व २६।२४-३८ :
सार्त्तनादं महत् कृत्वा विदन्तो दन्तिनां वरः ।
पपात स महामात्रो वज्रभिन्न इवाचलः ॥ ३८