काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६ काव्यादर्श [३।२६
२२. करेण ते रणेध्वन्तकरेण द्विषतां हताः ।
करेणवः क्षरद्रक्ता भान्ति सान्ध्यघना इव ॥ २६ ॥
२२. युद्धोंमें शत्रुओंका अन्त करने वाले तुम्हारे हाथसे हत, खून झराते
हाथी सन्ध्या कालके मेघोंके समान प्रतीत होते हैं ॥ २६ ॥
भी यह आशय व्यक्त होता है : 'राजकात्' में 'राजन् + क' (कुत्सा अर्थमें
'क' प्रत्यय) से कापुरुष राजा रामगुप्त या कामुक होनेसे निन्दित शकाधि-
पति अभिप्रेत हो सकता है । 'उर्वी' ध्रुवस्वामिनीको व्यक्त करता है ।
'ध्रुवा', 'अचला', 'उर्वी' पर्याय हैं । 'वराहि' से महावराहसमान चन्द्रगुप्तके
द्वारा कुचले हुए रामगुप्त या शकाधिपति अभिप्रेत प्रतीत होते हैं । इस प्रकार
यहाँ कवि द्वारा शकारानि चन्द्रगुप्त विक्रमादित्यकी प्रशंसा की गई है ।
डॉ० कृष्णकुमारका यह कथन उचित नहीं प्रतीत होता कि यहाँ 'वराह'
चालुक्य वंशके राजचिह्नकी ओर सङ्केत करता है ।२ दण्डी काञ्चीके पल्लव
राजाओंके आश्रित थे, यह सुविदित है । यह डॉ० कृष्णकुमार भी मानते
हैं । चालुक्योंका पल्लवोंसे पीढ़ियोंसे वैर था । चालुक्यों द्वारा काञ्चीपर
घेरा डालनेके कारण दण्डीको अध्ययनकालमें दर-दर भटकना पड़ा था
(प्रथम परिच्छेदकी भूमिका देखें) । ऐसी स्थितिमें वे शत्रु राजाकी प्रसंशामें
कसीदे कहें, यह सम्भावित नहीं है ॥ २५ ॥
२२. (२. ग. १.) प्रथम-द्वितीय-तृतीयपादादिगत व्यपेत सुकर त्रिपादादि-
यमक - व्यपेत त्रिपादयमकके इस प्रथम उदाहरणमें आचार्य कवि दण्डीने
किसी राजाका शौर्य युद्धमें उसके द्वारा मारे गए हाथियोंके३ वर्णनसे बताया
है । हाथियों (उपमेय) की समानता सान्ध्य घनोंसे बताई है । सादृश्यका
निमित्त उपमेयमेँ तो 'क्षरद्रक्ताः' विशेषणसे दिया है, उपमान घनोंमें वह
'सान्ध्य' विशेषणसे गम्य है । कठोर महाप्राण वर्णोंकी बहुलता तथा बीच-
बीचमें कोमल अल्पप्राण वर्णोंसे युक्त रचना उत्साह भावके अनुकूल है ।
'करेण' वर्णसमुदायकी आवृत्ति पहले तीन पादोंके आदिमें वर्णान्तरके व्यव-
१. अष्टाध्यायी ५।३।७० : प्रागिवात् कः । ७४ : कुत्सिते ।
२. अलङ्कारशास्त्रका इतिहास, पृष्ठ १०२ ।
३. 'करेणुरिभ्यां स्त्री, नेभे ।' (अमरकोष ३।३।५२) तथा 'करेणुर्गजयोषायॉ
स्त्रियां, पुंसि मतङ्गजे ।' (मेदिनीकोष १५।४१) के अनुसार 'करेणु'
शब्द उभयलिङ्ग है । यहाँ उपमान घनोंके पुंस्त्वके कारण पुंल्लिङ्ग
('हाथी' अर्थ) में अभीष्ट मानना उचित है ।