काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ काव्यादर्श [३।१३-१४
१०. निगृह्य नेत्रे कर्षन्ति बालपल्लवशोभिना ।
तरुणा तरुणाकृष्टानलिनो नलिनोन्मुखाः ॥ १३ ॥
(१. १ अव्यपेत पादादि ग. त्रिपाद यमक)
११. विशदा विशदामत्तसारसे सारसे जले ।
१०. कोंपलोंसे सुशोभित वृक्षके द्वारा आकृष्ट युवाओंको कमलोंपर मँड-
राते हुये भ्रमर दोनों आँखें जकड़कर खींच लेते हैं ॥ १३ ॥
११. अवगाहन करते हुए, खूब मत्त सारसी-सारसों वाले सरोवरके जल
अवस्था' प्रेमकी दशवीं अवस्था है ।¹ बाकी नौ दशाएँ तो हो चुकी हैं । दसवीं
की कसर है । अतः समय रहते चेत जाओ ! कोमलाङ्गी अबलाके वधका
महापाप अपने सिर मत लो !
रत्नश्रीज्ञान और वादीजी द्वारा दिया 'तादृशीम्' पाठभेद 'अङ्गनाम्'का
विशेषण है, जो अङ्गनाकी प्रेमपरवशताको व्यक्त करता है ॥ १२ ।
१०. (१. ख. ६.) तृतीय-चतुर्थपादादि अव्यपेत सुकर द्विपादयमक—
तेरहवें श्लोकमें कवि आचार्य दण्डीने रति भावके उद्दीपन विभाव वसन्तमें
वृक्षोंके पल्लवित होने तथा कमलोंपर मँडराते भौरोंके द्वारा तरुणोंको आकृष्ट
किये जानेका वर्णन किया है । यहाँ बालपल्लवशोभी तरुसे तरुणीका नवयौवन
के अङ्कुरोंसे सुशोभित देह व्यक्त होता है तथा नलिनोन्मुख भ्रमरोंसे
नलिन (कमल) के सदृश मुखपर स्थित चञ्चल कजरारे नयन अभीष्ट हैं :
पहले तरुणीका छरहरा खिलता हुआ शरीर तरुणोंका आकर्षण करता है,
फिर उनको जकड़कर खींच लेते हैं मुखकमलपर मँडराते नयनभ्रमर । इस
प्रकार यहाँ वस्तुसे रूपक ध्वनित है । श्लोकके पूर्वार्धमें कण्ठ्य और दन्त्य
वर्णोंकी आवृत्तिसे श्रुत्यनुप्रास है । उत्तरार्धके दोनों पादोंके आदिमें एकेक
वर्णसमुदाय निरन्तर रूपसे आवृत्त है । अर्थावबोधमें क्षणांशकी भी बाधा न
होनेसे यह यमक सुकर है ॥ १३ ॥
(१.ग) त्रिपादादि अव्यपेत सुकर यमक—आचार्यने अगले चार (१४-
१७) श्लोकोंमें तीन पादोंके आदिमें निरन्तर (अव्यपेत) सुकर यमकके चार
उदाहरण प्रस्तुत किये हैं ।
१. एवंविधैः कामलिङ्गैरप्राप्तसुरतोत्सवा ।
दशावस्थागतं कामं नानाभावं प्रदर्शयेत् ॥ नाट्य० २२।१६०-१६१
सर्वैः कृतैः प्रतीकारैर्यदि नास्ति समागमः ।
कामाग्निना प्रदीप्ताया जायते मरणं ततः ॥ १६२