काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ काव्यादर्श [३।१०-११
नीयते च पुनस्तृप्तिं वसुधा वसुधारया ॥ १० ॥
८. करोति सहकारस्य कलिकोत्कलिकोत्तरम् ।
मन्मनो मन्मनोऽप्येष मत्तकोकिलनिस्वनः ॥ ११ ॥
फिर धनकी धारसे तृप्त की जाती है ॥ १० ॥
८. आमकी बोर मेरे मनको प्रबल उत्कण्ठासे युक्त कर रही है । मत्त
कोकिलकी यह अव्यक्त मधुर सुरतालापरूपी कूक भी (मेरे मनको अत्यधिक
उत्कण्ठायुक्त कर रही है) ॥ ११ ॥
युद्धवीर और वसुधोपलक्षित प्रजाकी वसुधारासे तृप्तिके वर्णनसे दानवीर
स्वरूपकी व्यञ्जना की गई है । कर्ता 'नृप' और एक कर्मकारक 'वसुधा' का
भिन्न क्रियाओं 'जीयते' और 'नीयते' से सम्बन्ध होनेसे यहाँ द्रव्य (कारक)
दीपक है । तालव्य और दन्त्य वर्णोंकी आवृत्तिसे श्रुत्यनुप्रास माधुर्यकारक
है । प्रथम और चतुर्थ पादोंके आदिमें एकेक वर्णसमुदायकी सुकर तथा निर-
न्तर आवृत्तिसे अव्यपेत द्विपादद्वयमक है । यह यमक मुख्य भाव द्विविध
उत्साहकी अभिव्यक्तिमें कथमपि बाधा नहीं डालता । अतः यह यमक मधुर
(रसाविरोधी) है ॥ १० ॥
८. (१. ख. ४) द्वितीय-तृतीय-पादादि द्विपाद अव्यपेत सुकर यमक--
ग्यारहवें श्लोकमें आम्रमञ्जरी और कोयलकी कूक उद्दीपन विभाव तथा
अत्यधिक उत्कण्ठासे युक्त करना अनुभावसे विप्रलम्भरति व्यक्त की गई है ।
कोकिलकी कूकपर सुरतालापके आरोपसे रूपक भी इसके अत्यधिक अनुकूल
है । कण्ठ्य और दन्त्य वर्णोंकी आवृत्तिसे जन्य श्रुत्यनुप्रास माधुर्यका सर्जक
है । द्वितीय पादमें कलिकोत् वर्णसमुदायकी तथा तृतीय पादमें मन्मनो वर्ण-
समुदायकी निरन्तर सुकर आवृत्तिसे जनित यमक इस माधुर्यको और पुष्ट
कर रहा है । इस प्रकार यहाँ यमक विप्रलम्भको उद्दीप्त ही कर रहा है ।
उसकी शोभाको कम नहीं कर रहा । अतः यमक अङ्ग है और विप्रलम्भरति
अङ्गी ।
तृतीय पादमें आवृत्त 'मन्मनः' को रत्नश्रीज्ञानने 'मत् + मनस्' ही समझा
है । वादी जङ्घालदेवने 'अत्यन्त मधुर' अर्थ किया है, १ तो तरुण वाचस्पतिने
मथ् + √ मन् से निष्पादित करके 'पीडाकर' अर्थमें पर्यवसित किया है । शब्द-
१. रत्नश्री : मत्तस्य कोकिलस्य निस्वनः = शब्दोऽप्येष मधुरो 'मन्मन
उत्कलिकोत्तरं करोति' इति प्रकृतम् । वादीटीका : मन्मनोऽत्यन्तमधुरो
मधुरतरोऽप्येष मत्तकोकिलनिस्वनः ।