काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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के भङ्गवान् अनुप्रासपर आधारित है । वाक्यकी भी आवृत्ति हो जाती है ।¹
महाराज भोज यमक और लाटानुप्रासको पृथक्-पृथक् मानते हैं । इस
लिये उन्होंने भी (१) लक्षणमें भामहका और (२) भेदकथनमें दण्डीका अनु-
करण किया है ।² एक अन्तर है : अव्यपेत, व्यपेत और उभयात्मकको उन्होंने
समुद्गापरपर्याय अर्धाभ्यास यमकमें सीमित माना है । दण्डीके समान साधा-
रण भेद नहीं बताया है ।³ इसके अतिरिक्त इन्होंने कई वर्णोंकी आवृत्तिमें
स्थूल और अल्पवर्णों (दो वर्णों) की आवृत्तिमें सूक्ष्म भेद भी माने हैं । रत्ने-
श्वरमिश्रने एकवर्णकी आवृत्तिको सूक्ष्मतर बताया है ।⁴ आवृत्तिकी विषय
वर्णसंहतिकी विभिन्नार्थतापर रत्नेश्वरमिश्रका यह कथन महत्त्वपूर्ण है कि
इससे अर्थके अभेदका अभाव अभिप्रेत है । इससे दोनों वर्णसमुदाय या एक
निरर्थक भी हों, तब भी यमक रहता है ।⁵ अर्थात् यमकमें वर्णसमुदायकी
अर्थवत्ता आवश्यक नहीं है । यदि अर्थ हो, तो वह समान नहीं होना
चाहिये ।
मम्मटका यमकका लक्षण रत्नेश्वरमिश्रकी इस व्याख्याका आधार है :
अर्थ होनेपर अर्थके कारण भिन्न वर्णोंकी पुनः श्रुति यमक होता है । मम्मटके
इस लक्षणका आधार भामहका लक्षण है । मम्मटने लाटानुप्रास और यमकमें
१. स्वतन्त्रस्यान्यतन्त्रस्य पदस्यावर्तना द्विधा ।
भिन्नप्रयोजनपदस्यावृत्तिं मनुजा विदुः ॥ अग्निपुराण० ३४३।१८
द्वयोरावृत्तपदयोः समस्ता स्यात् समासतः ।
असमासात् तयोर्व्यस्ता पादे त्वेकत्र विग्रहात् ॥ १९
वाक्यस्यावृत्तिरप्येव यथासम्भवमिष्यते । २०
२. विभिन्नार्थैकरूपाया याऽऽवृत्तिर्वर्णसंहतेः ।
अव्यपेतव्यपेतात्मा यमकं तन्निगद्यते ॥ सरस्वती० २।५८
३. अर्धाभ्यासः समुद्गः स्यात्, तस्य भेदास्त्रयो मताः ।
व्यपेतश्चाव्यपेतश्च उभयात्मा च सूरिभिः ॥ सरस्वती० २।६६
४. सरस्वतीकण्ठाभरण २।६४ तथा इसपर रत्नदर्पण : 'स्थूलं सूक्ष्मं च' इति
पूर्वेणापि सम्बध्यते । बहुवर्णवृत्ति स्थूलम् । अबहुवर्णवृत्ति सूक्ष्मम् ।
उदाहरण १२७ पर : वर्णद्वयपर्यन्तमावृत्तिः सूक्ष्मता । सैवैकवर्णगोचरा
सूक्ष्मंतरा ।
५. रत्नदर्पण २।५८ : 'विभिन्नार्था' इत्यर्थाभेदव्यतिरेकपरम् । तेन द्वयोरेकस्य
वा निरर्थकत्वेऽपि यमकमुपगृहीतं भवति ।