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सर्वकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 253

२३० काव्यादर्शः [३।१८६-१८७
(उपसंहार)
शब्दार्थांलङ्क्रियाश्चित्रमार्गाः सुकर-दुष्कराः ।
गुणा दोषाश्च काव्यानामिति संक्षिप्य दर्शिताः ॥ १८६॥
(फलश्रुति)
व्युत्पन्नबुद्धिरमुना विधिविदर्शितेन
मार्गेण दोषगुणयोर्वशवर्तिनीभिः ।
काव्योंके (१) शब्दके और (२) अर्थके अलङ्कार, (३) सुकर और (४)
दुष्कर चित्र अलङ्कारके विविध प्रकार, (५) गुण एवं (६) दोष इस प्रकार
सङ्क्षेप करके दिखला दिये हैं ॥ १८६ ॥
अपूर्वका विधान करनेके द्वारा दर्शित इस पद्धतिसे दोष और गुण
(काव्यके शोभाघातक और शोभाविधायक धर्मों) के विषयमें ज्ञानसम्पन्न बुद्धि
उपसंहार—काव्यादर्शके प्रारम्भमें आचार्यने काव्यका स्वरूप बताना
(काव्यलक्षण) काव्यादर्शका उद्देश्य बताया था । उसके अन्तर्गत उन्होंने (१)
इष्टार्थकी गमक पदावली अर्थात् शब्द और अर्थरूपी शरीरका वर्णन विविध
प्रकारसे—छन्दोविधान, भाषाविधान, विनियोगकी दृष्टिसे—प्रथम परिच्छेद
में किया है । फिर (२) उस शरीरके (क) मार्गविशेषसे सम्बद्ध विशेष
अलङ्कारों गुणोंका निरूपण मार्गविभागके रूपमें प्रथम परिच्छेदके शेष भागमें
करके (ख) साधारण अलङ्कारोंका विवेचन द्वितीय और तृतीय परिच्छेदोंमें
किया है । इस परिच्छेदमें उन्होंने सुकर और दुष्कर चित्रालङ्कारोंका
प्रस्थान (१) यमक, (२) विविध आकारबन्ध, (३) वर्णनियमवान् बन्ध
और (४) प्रहेलिकाओंके रूपमें किया है । उसके अनन्तर (ग) काव्यके
सर्वमार्गसाधारण दोषोंका निरूपण तृतीय परिच्छेदके शेष भागमें किया है ।
॥ १८६ ॥
काव्यादर्शके तृतीय परिच्छेदके विषयोंका सङ्ग्रह प्रकृत उपसंहारश्लोकमें
आचार्य दण्डीने प्रस्तुत किया है :
फलश्रुति--तृतीय परिच्छेदके अन्तिम श्लोकमें आचार्य दण्डीने काव्या-
दर्शमें प्रतिपादित मार्गका अनुसरण करनेकी फलस्तुति एक रमणीय उपमाके
साथ बताई है ।
अपूर्वका कथन विधि होता है एवं पूर्वतः प्राप्तका कथन अनुवाद । अपने
निरूपणको आचार्यने 'विधि' कहा है । इसका आशय यह है कि आचार्यने
जिस भी विषयका प्रतिपादन किया है, उसे अपूर्वविधानके रूपमें प्रस्तुत किया
है । अर्थात् अपनी मौलिक उद्भावनाएँ की हैं ।