काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
पृष्ठ 243, कुल 270 में से
संदर्भ में पढ़ें२१८ काव्यादर्श, [३।१८१-१८२
धून्वन् कदम्बरजसा सह सप्तच्छदोद्गमान् ॥ १८१ ॥
(ग) दोलाऽति प्रेरणत्रस्तवधूजनमुखोद्गतम् ।
कदम्ब पुष्पोंकी परागके साथ सप्तच्छदके अङ्कुरोंको हिलाता हुआ वायु
चला ॥ १८१ ॥
(ग) झूलेको अधिक वेगसे झुलानेके कारण डरी (सहमी) हुई बहुओं
आते हैं । (३) खर वायु ग्रीष्ममें चला करता है । इस प्रकार भिन्नकाल-
भावी ये तीनों बातें यहाँ एककालभावीके रूपमें बताई होनेके कारण काल-
विरोधी हैं । किन्तु कविने इन्हें राजाओंके विनाशके सूचक दुर्निमित्त
(उत्पात), अपशकुनके रूपमें प्रस्तुत करके इस कालविरोधको दोष (उद्वेजक)
नहीं रहने दिया है, अपितु विवक्षित अर्थका पोषक होनेके कारण गुण बना
दिया है । प्रखर वायु, बेमौसमके पुष्पोद्गम आदि अशुभके सूचक उत्पात
शकुनशास्त्रमें और लोकमें प्रसिद्ध हैं ।¹
(१) शरद्ऋतुका समय, जब कि छतौनके वृक्षोंमें पुष्पोद्गम स्वाभाविक
होता है, राजाओंके विजयार्थ सैन्यप्रयाणका समय होता है । उस समय (२)
ग्रीष्ममें चलने वाली प्रखर हवा और (३) प्रयाणमें बाधक वर्षांमें फूलने
वाले कदम्बोंमें ऋतुके बीतनेपर भी पुष्पोद्गम अशुभ प्राकृतिक शकुन हैं ।
ये सब विजयार्थी राजाके विनाशके सूचक हैं ॥ १८१ ॥
(ग) कलाविरोध की गुणताका उदाहरण — सावनमें झूला झूलती बहुओं
को उनकी ननदों या सहेलियोंने झूलेको बहुत जोर-जोरसे झोंटे देकर डरा
१. भौम, आन्तरिक्ष और दिव्य महोत्पातोंका विशद वर्णन अवन्तिसुन्दरी,
पृष्ठ ५२-५४ तथा ११०-११८ में देखें । पृष्ठ ५२ : अनन्तरं च सर्वस्या-
मेवोर्व्यां सर्वंक्षत्र (विनाश) पिशुनाः <sup>...</sup> चरितुमारभन्त घोररूपा महो-
त्पाताः । तथा हि — <sup>...</sup>ऋतवः सर्वे एव स्वचिह्न लक्ष्म्याः समन्ततः सम
समाजग्मुः । <sup>...</sup>प्रसभोत्पाटितनिरस्तवृक्षवीरुधः, क्षुण्णपाषाणशर्कराः
क्षणमपि नोपरेमुरुग्रस्वनाः प्रभ्रमन्तः प्रभञ्जनाः । पृष्ठ ११८ : भ्रमन्ति
भीमा वायवः<sup>...</sup> ।
२. उत्पाता बहवस्तत्र निपेतुर्जायमानयोः ।
दिवि भुव्यन्तरिक्षे च लोकस्योरुभयावहाः ॥ श्रीमद्भागवतपु० ३।१७।३
ववौ वायुः सुदुःस्पर्शः फूत्कारानीरयन् मुहुः ।
अकाले फलपुष्पाणि देशोपद्रवकारणम् । विष्णुध० पु० १।३७ भी देखें ।