काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७६ काव्यादर्श [३।१४८
इस प्रकारका शास्त्रके द्वारा अननुमोदित पदोंका प्रयोग अनधीतशास्त्र
(अशिष्ट) लोग किया करते हैं । अतः व्याकरणके नियमोंका उल्लङ्घन
करना उन व्याकरणज्ञानशून्य लोगों (अशिष्टों) को इष्ट होता है । इस
प्रकारका व्याकरणविरुद्ध पदप्रयोग शब्दशास्त्रकी दृष्टिसे हीनएवम् अपशब्द
के रूपमें होनेके कारण 'शब्दहीन' कहलाता है । इसे 'शब्दच्युत' भी
कहा जाता है ।
व्याकरणसे सिद्ध नहीं होने वाला पदप्रयोग भी शिष्टोंको, शब्दशास्त्रके
अनुकूल प्रयोग करने वाले आप्त पुरुषोंको, यदि इष्ट है, वे इसके प्रयोगमें
दोष नहीं देखते हैं, तो ऐसा शिष्टानुमोदित प्रयोग दोष नहीं होता । मूर्धन्य
ध्वनियोंके दन्त्यी करण, दन्त्य ध्वनियोंके मूर्धन्यविधान, आत्मनेपद-परस्मैपदके
प्रयोगमें व्युत्क्रम, देशज शब्द आदि इसी श्रेणीमें आते हैं । इसके अतिरिक्त,
व्याकरण मुख्यतया परोक्षवृत्ति शब्दों तक अपना कार्य करता है । अतिपरोक्ष-
वृत्ति शब्दोंको मान्यता उसे भी उनके आप्त-गृहीत होनेके कारण देनी पड़ती
है । धातुपाठमें ऐसी बहुतसी धातु हैं, जो संस्कृतकी धातुओंसे विकसित हुई
हैं । संस्कृतके ध्वनिशास्त्र (वर्णविज्ञान) के अनुसार वे संस्कृतकी प्रकृतिके अनु-
कूल नहीं हैं । पर शिष्टेष्ट होनेके कारण उन्हें धातुपाठोंमें समाविष्ट कर लिया
गया है । जैसे √घिण्ण्, √घुण्ण् और √घृण्ण् धातु संस्कृत √गृह्ण अङ्गसे
विकसित हैं : संस्कृत 'ऋ' का उच्चारण कुछ प्रदेशोंमें इकारश्रुतिसे होता है,
तो कुछ प्रदेशोंमें उकारश्रुतिसे¹, महाप्राण ह्' के लोपकी क्षतिपूर्ति अल्पप्राण
'ग्' के 'घ्' के रूपमें उच्चारणसे होती है । (क) अल्पप्राणयोंके इस प्रकार
महाप्राणीकरण, (ख) 'ऋ' के रेफातिरिक्त स्वरांशके 'इ' 'उ' के रूपमें उच्चा-
रणकी देशज प्रवृत्तियोंसे ये तीन धातु संस्कृत 'गृह्णाति' या 'गृह्णीते' से विक-
सित हुई हैं और संस्कृत धातुपाठोंमें ग्रहण कर ली गई हैं ।² यही स्थिति व्या-
करणके अन्यविध नियमोंकी है । यह नियमोंका उल्लङ्घन भाषाके विकासकी
प्रक्रियामें जब तक तरल रहता है, अभिजात वर्ग द्वारा समादृत नहीं होता है,
तब तक इसे 'अशिष्टेष्ट' कहा जाता है, और ये प्रयोग दोषकी कोटिमें आते
हैं । जब ये अभिजात वर्गमें प्रवेश कर लेते हैं, तब ये शिष्टोंके चहेते (शिष्टेष्ट)
बन जानेके कारण लोकमें और लोकका ही आराधन करने वाले काव्यमें भी
स्वीकृत हो जाते हैं । मनस् = मन, = मन् की यात्रा इस प्रकारकी है । 'मन्'
१. निरुक्तमीमांसा, पृष्ठ ४३३ देखें ।
२. पाणिनीय धातुपाठ, भ्वादिगण : घिणि, घुणि, घृणि ग्रहणे । विशेषार्थ
सिद्धान्तकौमुदी, भवतोषिणी, भ्वादिगण तथा धातु-सूची देखें ।