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सर्वकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 195, कुल 270 में से

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पृष्ठ 195

१७२ काव्यादर्श [३।१४४-१४५
(५) उद्देशानुगुणोऽर्थानामनुद्देशो न चेत् कृतः ।
अपक्रमाभिधानं तं दोषमाचक्षते बुधाः१ ॥ १४४ ॥
स्थिति-निर्माण-संहार-हेतवो जगतामजाः ।
शम्भु-नारायणाम्भोजयोनयः पालयन्तु वः ॥ १४५ ॥
(५) पदार्थोंका अनुकथन यदि उद्देश (पूर्व कथन) के अनुसार नहीं
किया गया है, तो विद्वान् लोग उसे अपक्रम नामक दोष कहते हैं ॥ १४४ ॥
लोकोंकी (क) स्थिति (पालन), (ख) सृष्टि एवं (ग) संहार जिनके
कारण होते हैं, वे अजन्मा (क) शिव, (ख) विष्णु एवं (ग) कमलयोनि
(ब्रह्मा) तुम्हारी रक्षा करें ॥ १४५ ॥
वहाँ चतुर्थ पादमें संशयनिवारण किया गया है ।२
यह दोष भरतके दस दोषोंमें नहीं है । भामहने संशय ज्ञानका शास्त्रीय
स्वरूप बताकर यह कहा है कि वाक्यका प्रयोग निश्चत ज्ञानके लिये इष्ट
होता है, जिसमे कि श्रोता झूलता न रहे । उन्होंने ससंशयकी अलङ्कारताके
विषयमें कुछ नहीं कहा है ॥ १४३ ॥
(५) अपक्रम दोष--काव्योंमें कई पदार्थोंका परिगणन जिस क्रममें किया
गया है, उनका अनुदेश (बादमें प्रतिपादन) यदि उसी क्रममें न किया जाये,
पूर्वोक्त क्रमको तोड़कर किया जाये, तो वह अपक्रम (क्रमभङ्ग) नामक दोष
होता है । पाणिनिके अनुसार उद्दिष्टोंका अनुदेश उद्देशकी सङ्ख्याके अनुसार
होना चाहिये ।३ यह नियम काव्यमें भी पालनीय होता है । इसका भङ्ग
करनेपर काव्य सदोष हो जाता है ॥ १४४ ॥
उदाहरण—प्रकृत (१४५वें) श्लोकमें कविने पूर्वार्धमें तीन देवताओंके
तीन कार्योंका वर्णन जिस क्रमसे किया है, उत्तरार्धमें उनके सम्बन्धी देवताओं
१. रत्नश्रीमें 'बुधा:' की व्याख्या नहीं की है, 'यथा' की की है, 'आचक्षते'
के कर्ताके रूपमें 'कवय:' का अध्याहार किया है : अपक्रमं नाम दोषं तं
यथोक्तमाचक्षते कथयन्ति कवयः । 'यथा' इत्युदाहरति ।
२. राजा—बलवदसुस्थशरीरा शकुन्तला दृश्यते । (सवितर्कम्) तत् किमयं-
मातपदोषः स्याद्, उत यथा मे मनसि वर्तते ? अथवा कृतं सन्देहेन
स्तनन्यस्तोशीरं शिथिलितमृणालैकवलयं,
प्रियायाः साबाधं किमपि कमनीयं वपुरिदम् ।
समस्तापः कामं, मनसिजनिदाघप्रसरयोर्
न तु ग्रीष्मस्यैवं सुभगमपराधं युवतिषु ॥
३. अष्टा० १।३।१० : यथासङ्ख्यमनुदेशः समानाम् ।