काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
पृष्ठ 190, कुल 270 में से
संदर्भ में पढ़ें३।१३८ ] दोष : ( ३ ) एकार्थ अन्य आचार्योंके मतमें १६७
है; (४) दण्डीकी 'अनुकम्पादि' उक्तिका विस्तार विक्षिप्तचित्तता तथा भय
आदि पाँच अवस्थाओंके परिगणनसे किया है । (५) उदाहरणमें दण्डीके
उदाहरणकी अर्थच्छाया होते हुए भी उसकी अपेक्षा अर्थसौन्दर्य तो है ही नहीं,
दोषप्रदर्शन भी उतना चातुर्यपूर्ण नहीं है : 'उत्क'में 'मन' अर्थतः समाहित है,
उसी शब्दार्थांशको 'मनस्' से पुनः कहा है । इस प्रकार यहाँ अर्थकी पुनरुक्ति
है । भामहके भाष्यकार पं० देवेन्द्रनाथ शर्माने 'सौध' का अर्थ 'कोठा' किया
है । उन्हें वेश्याका कोठा तो अभिप्रेत नहीं होगा । पर 'सौध' का अर्थ 'राज-
सदन' होता है ।१ इसके अतिरिक्त, उन्होंने श्लोकके शेष तीन पादोंमें भी
एकार्थता मानी है : जलसे ध्वनि तभी होगी, जब वह मेघसे बरसे, या नाली
आदिसे गिरे । अतः 'ध्वनि' कहना ही पर्याप्त था; कोठोंकी छतपर बरसने
और नालीसे गिरनेका वर्णन पुनरुक्त मात्र हुआ ।२ पर यदि इसे दोष माना
जायेगा, तब तो प्रकृतिचित्रण आदिमें कविको विषयका सङ्केतमात्र देकर
पुनरुक्तको बचाना होगा । क्या 'अम्भसां ध्वनिः' मात्र कहनेपर, 'मेघमुक्ता-
नाम्' आदि विशेषणोंका प्रयोग न करनेपर, नेयत्व दोष नहीं हो जायेगा ?
दूसरे, यहाँ अभिन्न अर्थकी पुनरुक्ति कहाँ है ? दो विशेषणोंसे जलध्वनिका
द्वैविध्य क्या इसे भिन्न नहीं कर देता ? भामहने 'अभिन्न'के और भरतने
'एक' शब्दके प्रयोगसे उसी 'अविशेषेण अभिन्नता या एकता'को सूचित किया
है, जिसे दण्डीने स्पष्टतः लक्षणमें समाविष्ट किया है । अतः यहाँ ध्वनिका
विशेष अभिप्रेत होनेसे भी पुनरुक्तता नहीं है ।
इस विवरणसे यह सिद्ध होता है कि दण्डीका एकार्थनिरूपण भरत और
भामहके निरूपणसे निर्भ्रान्त, स्पष्ट, पूर्ण, अधिक सूचनासे युक्त एवं सुन्दर
तथा चातुर्यपूर्ण है । अहो सूक्ष्मेक्षिकाऽऽचार्यदण्डिनः ।
दण्डीके उदाहरणकी रेंड़ पीटी है भोजने । उन्होंने उसमें दो परिवर्तन
किये : (१) वर्षाकालके कारण उन्मनस्कताका विषय कोमल होनेसे अधिक
उचित बालाको न बनाकर पुरुषको बनाया है; (२) शब्दपौनरुक्त्यको प्रस्तुत
करनेको 'बालां तदलकत्विषः' के स्थान पर 'गम्भीराः स्तनयित्नवः'को रखकर
द्वितीय पादके शब्दोंकी पुनरुक्ति चतुर्थ पादमें बताई है । इससे यही उदाहरण
१. अमरकोष २।२।१० : सौधोऽस्त्री राजसदनम् ।
२. काव्यालङ्कार, बिहारराष्ट्रभाषापरिषत्, पटना, पृष्ठ ६३ ।