काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४८ काव्यादर्श [३।१२०
सन्तप्त मनुष्य मेघाच्छादित आकाशका अभिनन्दन करता है।' इस अर्थको
ऐसे पदोंसे कहा है, जो सम्बन्धोंकी परम्परासे सूर्य और मेघोंका अभिधान
करते हैं : वैदिक संहिताओंमें उल्लेख है कि श्येन (बाज) देवराज इन्द्रके लिये
सोम लाता है ।१ इतिहास-पुराणमें इस कथाका रूप बदल गया : गरुड देवराज
इन्द्रसे अमृतकलश जीत लाये२ । इसी कथाके आधारपर दण्डीने 'वि = पक्षीने
जिसका अन्न जीत लिया है, वह 'वि-जितान्न = इन्द्र' कहा है। उससे भव =
जन्म है अर्जुनका । उसका द्वेषी = शत्रु कर्ण है । उसका गुरु—पिता सूर्य है ।
इस प्रकार 'सूर्य' अर्थको नाना सम्बन्धोंके योगसे बताया है । इसी प्रकार
हिम—बर्फका अपह विनाशक अग्नि है । उसका अमित्र—शत्रु जल है । धर
उसे मेघ धारण करते हैं । इस तरह 'मेघैः' या 'जलधरैः' कहनेके लिये
सम्बन्धोंकी लम्बी परम्पराका प्रयोग किया गया है । अतः वास्तविक सञ्ज्ञा-
पदका परिहार करके व्यामोह करनेके कारण यहाँ 'पारिहारिकी' नामक प्रहे-
लिका है ।। १२० ।।
१. ऋ० ३।४३।७ : इन्द्र पिब वृषधूतस्य वृष्ण आ यं ते श्येन उशते जभार,
४।१८।१३: अधा मे श्येनो मध्वा जभार । २६।६ : ऋजीषी श्येनो ददमानो
अंशुं पदावतः शकुनो मन्द्रं मदम् । सोमं भरद् दादृहाणो देवावान् दिवो
अमुष्मादुत्तरादादाय ॥ २७।४ । ६।२०।६ : प्र श्येनो न मदिरमंशुमस्मै
शिरो दासस्य नमुचेर्मथायन् । ८।८२।६ : यं ते श्येनः पदाभरत् तिरो
रजांस्यस्पृतम् । पिबेदस्य त्वमीशिषे ।। काठकसं ३७।१४ में इन्द्र ही श्येन
का रूप धारण करके शुष्ण नामक दानवके मुखसे अमृतको चुराकर लाये
बताये हैं : असुरेषु तह्र्यं मृतमासीच्छुष्णे दानवे । तच्छुष्ण एवान्तरास्येऽ-
बिभः ।...तस्येन्द्रः श्येनो भूत्वाऽऽस्यादमृतं निरमुष्णात् ।
२. वैदिक सुपर्ण और गरुत्मान् ऋग्वेदीय श्येनके ही पर्याय हैं । श्येन द्वारा
सोमाहरणकी कथा ब्राह्मणोंमें सुपर्ण (गरुड) द्वारा सोमाहरणमें बदल गई
थी : ऋजिप्य ईमिन्द्रावतो न भुज्युं श्येनो जभार बृहतो अधिष्णोः ।
अन्तः पतत् पतत्र्यस्य पर्णमध यामनि प्रसितस्य तद् वैः (ऋ० ४।२७।४)
तुलना करें जैमिनीय ब्राह्मण १।३५५ : सोमं वै राजानं यत् सुपर्ण आज-
हार । तस्य यत् पर्णमपतत्, स एव पर्णोऽभवत् । महाभारत आदिपर्व
३०।४०-४४ तथा ३२-३३ अध्याय देखें ।'
समुत्पाटामृतं तत्र वैनतेयस्ततो बली ।
उत्पपात जवेनैव यन्त्रमुन्मथ्य वीर्यवान् ।। आदिपर्व ३३।१०