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सर्वकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 167, कुल 270 में से

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पृष्ठ 167

१४४ काव्यादर्श [३।११५-११६
(८) गिरा स्खलन्त्या नम्रेण शिरसा दीनया दृशा ।
तिष्ठन्तमपि सोत्कम्पं वृद्धे, मां नानुकम्पसे ॥ ११५ ॥
(६) आदौ राजेत्यधीराक्षि, पार्थिवः कोऽपि गीयते ।
सनातनश्च, नैवासौ राजा, नैव सनातनः ॥ ११६ ॥
(८) लड़खड़ाती वाणीसे, झुके सिरसे, दीन दृष्टिसे, कँपकँपाते खड़े हुए
भी मुझपर अरी बुढ़िया, तू कृपा क्यों नहीं करती ? ॥ ११५ ॥
(६) हे चञ्चल चितवन वाली, कोई पार्थिव आदिमें 'राजा' के रूपमें
कहा जाता है, और सनातन भी (कहा जाता है) । (किन्तु) वह न ही 'राजा'
है, न ही 'सनातन' है ॥ ११६ ॥
को उपलक्षक माना जा सकता है वर्णोंके स्थाननिर्देशसे व्यामोहकारी प्रहे-
लिकाका¹ ॥ ११४ ॥
(८) प्रकल्पिता — प्रकृत उदाहरण (श्लोक ११५) में इस प्रकारसे कथन
किया गया है कि उससे विवक्षित अर्थसे भिन्न अर्थका आभास होता है ।
विवक्षित अर्थ है : कोई दरिद्र अपनी दीन अवस्थाका वर्णन करता हुआ
लक्ष्मीको (क) पुराण पुरुषोत्तमकी वधू² होनेसे वृद्धा, अथवा (ख) वृद्धि-
स्वभावा होनेसे 'वृद्धा' शब्दसे अथवा (ग) 'वृद्धि' (समृद्धि) शब्दसे सम्बोधित
करके उससे शिकायत करता है कि वह उसपर दया क्यों नहीं करती ? परन्तु
इससे भिन्न अर्थ यह आभासित होता है कि कामका मारा कोई बुढऊ
(छोकरा नहीं डोकरा) किसी बुढ़िया (छोकरी नहीं डोकरी) से प्रेमकी भिक्षा
माँग रहा है । अतः यह प्रकल्पिता है ॥ ११५ ॥
(६) नामान्तरिता — प्रकृत (११६वें) श्लोकमें पार्थिवको पहले 'राजा'
१. य एवादौ, स एवान्ते, मध्ये भवति मध्यमः ।
अस्यार्थं यो न जानाति, तन्मुखे तं ददाम्यहम् ॥
यहाँ 'जो ही आदिमें है, वही अन्तमें है, बीचमें बीच वाला है । जो इसका
अर्थ नहीं जानता, उसके मुँहमें उसे देता हूँ ।' कथन व्यामोहकारी है ।
समाधान है : 'य' ही आदि में है, 'स' ही अन्तमें है, और 'एवादौ' तथा
'एवान्ते' के बीच वाला 'व' बीचमें है : यवस । जो इत्तीसी बात नहीं
जानता, उस अज्ञानी पशुके मुँहमें मैं उसे ('यवस', 'घास') देता हूँ ।
२. पुंसः पुराणादाच्छिद्य श्रीस्त्वया परिभुज्यते । काव्यादर्श २।३४३