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सर्वकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 156, कुल 270 में से

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पृष्ठ 156

३।१०७ ] ४. प्रहेलिकाओंका उपसंहार १३३
दोषानपरिसङ्ख्येयान् मन्यमाना वयं पुनः ।
साध्वीरेवाभिधास्यामस्ता दुष्टा, यास्त्वलक्षणाः ॥ १०७ ॥
किन्तु दोषोंको अनादरणीय मानते हुए हम निर्दोष (पहेलियाँ) ही
कहेंगे । दोषयुक्त वे होती हैं, जो तो उनके लक्षणसे रहित हैं ॥ १०७ ॥
व्यपदेशित्वका जो तत्त्व आवश्यक बताया है, वह पूर्वाचार्यानुसारिणी इन
षोडशविध प्रहेलिकाओंमें तनिक भी नहीं है । इस आधारपर यह कहना
कदाचित् अनुचित न होगा कि दण्डीकी प्रहेलिकाओंके निरूपक पूर्वाचार्योंमें
रामशर्मा सम्मिलित नहीं हैं । दण्डीने अवन्तिसुन्दरीकथामें अपने समयके बुधों
में केरलके एक रामशर्माका उल्लेख किया है । यदि अच्युतोत्तरके लेखक
यही रामशर्मा हैं, तो हो सकता है कि काव्यादर्शके प्रणयन तक उसकी रचना
न हो पाई हो । इसी कारण दण्डीने उनके चिन्तनका उल्लेख यहाँ न करके
अपने समयमें चर्चामें आ चुकी निर्दोष और सदोष पहेलियोंका उल्लेख किया
है । आचार्य रत्नश्रीज्ञानका 'पूर्वाचार्यै रामशर्मादिभिः' कथन भामहके उल्लेख
पर, अथवा अन्य सुनी-सुनाई बातोंपर, आधारित प्रतीत होता है । उन्हीं
पूर्वाचार्योंने इनके अतिरिक्त १४ दोषयुक्त पहेलियाँ बताई हैं ॥ १०६ ॥
प्रहेलिकाओंको दुष्ट बनाने वाले ये दोष किस प्रकारके हैं, यह सङ्केत न
आचार्य दण्डीने किया है, और न किसी अन्य आचार्यने ही किया है । आचार्य
दण्डीने १०७वें श्लोकमें मात्र इतना कहा है कि जिन पहेलियोंपर उनके लक्षण
पूरी तरह नहीं घटते, वे दुष्ट पहेलियाँ हैं । पदसन्धिके कारण सम्पन्न
(१) समागता नामक पहेलीमें दोषकी सम्भावना नहीं है । अतः वह तो शुद्ध
ही रहेगी । शेष चौदह असङ्कीर्ण प्रहेलिकाओंकी प्रस्तुतिमें किसी लक्षणगत
त्रुटिके कारण वे चौदह प्रहेलिकायें दोषयुक्त होंगी । रत्नश्रीज्ञानने आचार्यके
इस कथनको यों प्रस्तुत किया है : उन (प्रहेलिकाओं) के लक्षणके विरोधके
१. रत्नश्री ३।१०६ : तल्लक्षणविरोधाद् दुष्टा हेयाश्च ताः प्रहेलिकाश्चेति
दुष्टप्रहेलिकाः । ००० अत एव समागतादिविलक्षणत्वादन्‍याश्चतुर्दश तैः
पूर्वाचार्यैरधीता = निर्दिष्टा इति । १०७ : 'कथं तर्हि दुष्टप्रहेलिका
ज्ञायन्ते, यथा वर्ज्येरन् ? न हि दुष्टतयाऽज्ञातानां परिहारः सम्भवति ।'
इत्याशङ्क्य तत्प्रत्युपायमाह - 'याः = प्रहेलिकाः, 'तु'-शब्दोऽर्थान्तरविव-
क्षायाम्, यथोक्तलक्षणविरहान्न विद्यते लक्षणमासामित्यलक्षणाः, ताः
स्वयमेव दुष्टा ज्ञायन्ते; प्रतिनियतलक्षणव्युत्पत्तेरतल्लक्षणानां तदाभासता-
प्रतिपत्तेः । किं तासां प्रपञ्चप्रयासेन ?' इति ।