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सर्वकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 154, कुल 270 में से

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पृष्ठ 154

३।१०४] ४. प्रहेलिकाके भेदोंके लक्षण १३१
(१३) योग-मालाऽऽत्मकं नाम यस्याः, सा पारिहारिकी ।
(१४) एकच्छन्नाऽऽश्रितं व्यज्य यस्यामाश्रयगोपनम् ॥ १०४ ॥
(१३) जिस (पहेली) का नाम (सञ्ज्ञापद) सम्बन्धोंकी मालाके रूपमें
होता है, वह पारिहारिकी (प्रसिद्ध नामका परिहार करके सम्बन्धोंके अभि-
धानसे निष्पन्न) होती है । (१४) एकच्छन्ना वह है, जिसमें आधेयको व्यक्त
करके आधारको छुपाया जाता है ॥ १०४ ॥
स्वाभाविक है, पर निर्देश करनेपर व्यामोह होना उक्तिकी विशिष्टता है ।
इसी विशेषता (अतिशय) को आचार्यने ‘अपि’से कहा है ।१ व्यामोहका
कारण अस्पष्ट अभिधान है । अतः यह भेद अर्थगूढ है । उदाहरण ११६वें
श्लोकमें है ॥ १०३ ॥
(१३) पारिहारिकी—जिस प्रहेलिकाके सञ्ज्ञा शब्द सम्बन्धोंकी मालाके
रूपमें हों, वह प्रहेलिका प्रसिद्ध सञ्ज्ञा पदका परिहार करनेके कारण ‘पारि-
हारिकी’ कहलाती है । इस प्रहेलिकामें वस्तुका अभिधान सीधे स्पष्ट वाचक
शब्दोंसे न करके, वाचकोंका प्रयोग बचाते हुए, सम्बन्धोंके अभिधानसे
परम्परया किया जाता है । अतः यह भी अर्थ-गूढा है । उदाहरण १२०वें
श्लोकमें है ।
(१४) एकच्छन्ना—आश्रयाश्रयिभाव सम्बन्ध द्विष्ठ होता है । जब
आश्रितके धर्म (द्रव्य, गुण और क्रिया) का तो अभिधान किया जाये, किन्तु
इनके आश्रय (आधार धर्मी) को छुपाया जाये,२ तब एकको छुपानेके कारण
‘एकच्छन्ना’ प्रहेलिकाभेद निष्पन्न होता हैं । यह आश्रयरूप अर्थके निगूहनके
कारण अर्थगूढा है । धर्मोंके कथनसे धर्मीकी कल्पनामें कुछ चमत्कार होता है;
आश्रयको कहनेसे धर्म स्वतः उक्त हो जाते हैं; अतः व्यामोहकत्व आश्रय-
गोपनमें ही है, आश्रितगोपनमें नहीं ।
इस भेदको ‘एकच्छन्ना’ कहना तो तभी उचित होता, जब दो सम्बन्धियों
में किसीके भी गोपनसे व्यामोह होता । इसलिये इसे ‘धर्मिच्छन्ना’ कहना
अधिक उचित है । सम्भवतः, अगले ‘उभयच्छन्ना’ भेदमें भेदकके रूपमें सङ्-
ख्या (उभय) का प्रयोग विवक्षित होनेसे आचार्यने इस भेदमें भी उसे ही
भेदक मानकर सञ्ज्ञा बनाई है । उदाहरण १२१वें श्लोकमें देंगे ॥ १०४ ॥
१. रत्नश्री : अतिशये ‘अपि’-शब्दः ।
२. वादिटीका : एकच्छन्ना नाम सा, यस्यामाश्रितं नाम धर्म द्रव्य-गुण-कर्म-
लक्षणमभिव्यज्य प्रकाश्य तद्धर्माधारस्याश्रयस्य धर्मिणो गोपनम् ।