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सर्वकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 140, कुल 270 में से

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पृष्ठ 140

२।६३] ३. (३.२) त्रि-वर्ण-नियमवान् चित्र बन्ध : ११७
दिवन्दुदाव नादेन दाने दानवनन्दिनः ॥ ९३ ॥
करने वाले देव (नृसिंह रूपधारी विष्णु) ने दानवनन्दन (हिरण्यकशिपु) के
खण्डन (दान, विदारण) (प्रयुक्त) गर्जना (नाद) से आकाशको विदीर्ण कर
दिया ॥ ६३ ॥
पुराणप्रसिद्ध कथाको आचार्य दण्डीने तिरानवेंवे श्लोकमें बताया है। ब्रह्मासे
वर प्राप्त करनेके बाद निश्चिन्त हुए हिरण्यकशिपुने वेदप्रतिपादित
मर्यादाओंको तोड़ना शुरू किया। १ हरिभक्त प्रह्लादसे चिढ़कर उसने 'स्तम्भमें
स्थित विष्णु तेरी रक्षा करेगा' कहकर उस स्तम्भपर मुष्टिकाका प्रहार
किया। ३ उस स्तम्भसे तभी अति भीषण निनद (गर्जना) हुआ, जिससे
ब्रह्माण्ड कटाह ही फूटनेको आया और ब्रह्मादि देवोंको भी लगा कि अब
उनके लोकका प्रलय होने ही वाला है। ४ श्रीमद्भागवतकी इस कथाको आचार्य
दण्डीने सङ्केतात्मक 'वेदनन्दिनः', 'दाने नादेन दिवं दुदाव' से व्यक्त किया है।
यहाँ स्वर तो विविध प्रकारके अ, इ, उ, ए तथा ओ आये हैं। किन्तु ये
चित्रत्वप्रयोजक नहीं हैं। व्यञ्जन केवल तीन हैं : (i द १३ बार, (ii) न १८
बार, (iii) व छह बार । इन व्यञ्जनोंका प्रयोग पीछेके उदाहरणोंमें पूरे
पादमें या श्लोकके काफी बड़े हिस्सेमें लगातार एक ही व्यञ्जनके प्रयोगके
रूपमें हुआ है; किन्तु यहाँ यह एक उचित व्यवधानसे हुआ है। इससे यह
बन्ध बहुरंगी मनकोंसे व्यवहित ग्रथित मालाके समान सुशोभित हो गया है।
इससे आचार्य 'स्थाननियमके निबन्धनका यह भी एक प्रकार है', यह सूचित
करना चाहते हैं। ५ इस ग्रथनसे यहाँ अनुप्रासकी भी सुन्दर सृष्टि हो गई है।
१. दितेर्द्वाविव दायादौ दैत्य-दानव-वन्दितौ ।
हिरण्यकशिपुर्नाम, हिरण्याक्षश्च कीर्तितौ ॥ श्रीमद्भागवत ६।१८।११
२. स एव वर्णाश्रमिभिः क्रतुभिर्भूरि-दक्षिणैः ।
इज्यमानो हविर्भागानग्रहीत् स्वेन तेजसा ॥ श्रीमद्भागवत ७।४।१५
एवमैश्वर्यमत्तस्य दृप्तस्योच्छास्त्रवर्तिनः ।
कालो महान् व्यतीयाय ब्रह्मशापमुपेयुषः ॥ २०
यदा देवेषु, वेदेषु, गोषु, विप्रेषु, साधुषु ।
धर्मे मयि च विद्वेषः, स वा आशु विनश्यति ॥ २७
३. खङ्गं प्रगृह्योत्पतितो वरासनात्तस्तम्भं तताडातिबलः स्वमुष्टिना । । ८।१५
४. तदैव तस्मिन्निनदोऽतिभीषणो बभूव येनाण्डकटाहमस्फुटत् ।
यं वै स्वधिष्ण्योपगतं त्वजादयः श्रुत्वा स्वधामाप्ययमङ्ग मेनिरे ॥१६
५. इसकी चर्चा ३।८४, पृष्ठ १०६ में की जा चुकी है।