सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 270 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 137

११४ काव्यदर्श [३।६१
(२.४) अगा गाङ्गाङ्ककाकाक-गाहकाघक-काक-हा ।
अ-हाहाऽङ्ग, ख-गाङ्गाग-कङ्काग-खगकाककः१ ॥ ६१ ॥
(२.४) गङ्गाके जलमें (जलविहारमें अपेक्षित राजस) चञ्चलतासे रहित
होकर, अर्थात् सात्त्विक पुण्यबुद्धिसे, अवगाहन (स्नान) करने वाले, हा-हाकार
(शोक, धिक्कारके शब्दों) को (गङ्गास्नानसे पवित्र होनेके कारण) नहीं
प्राप्त करने वाले आकाशमें गतिशील सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र आदि ज्योतियोंको
अङ्कमें धारण करने वाले (सुमेरु) पर्वतको अर्थात्, वहाँ स्थित सभी २१ स्वर्गों२
को प्राप्त करने वाले (हे सत्पुरुष), महा-पातक आदि निन्दित पापों रूपी
कौवोंको (स्नानके पुण्यसे) नष्ट करने वाले तथा स्थावर जङ्गम दोनों रूपोंमें
स्थित ब्रह्मकी प्राप्तिके सुख वाले होकर आदित्यमण्डलकी प्राप्ति रूपी वैराज
पदको प्राप्त (ही) हो गए हो, अर्थात् इस पदको अवश्य प्राप्त करोगे ॥६१॥
(२.४) एकस्थान वर्णनियम चित्रबन्ध—इक्यानवेंवे श्लोकमें कविने गङ्गा-
स्नानके पुण्यका महत्त्व गङ्गास्नान करने वाले किसी पुरुषके लिए उत्तम
वैराजपदकी प्राप्तिकी आशंकासे व्यक्त किया है। इसमें कविने कण्ठ्य (१)
स्वर अ, आ का, (२ i) स्पर्श व्यञ्जनों क, ख, ग, घ, ङ, (ii) ऊष्म ह और
(iii) विसर्ग३ इन एक ही स्थान कण्ठसे उच्चार्य वर्णोंका मिलाजुला
(लयात्मक) प्रयोग किया है। रचनाकी दुष्करता स्पष्ट है।
गाङ्ग-काकाक-गाहक — गङ्गाया इदं गाङ्गम्, तस्येदम् (अष्टा० ४।३।१२०)
अण्, गाङ्गं च तत् कम् उदकम् गाङ्ग कम् गङ्गाजलम्, ककनं लौल्यं चाञ्चल्यम्,
कक लौल्ये (भ्वादि) न काकः अकाकः, अचञ्चलता, अकाकेन गाहते प्रविशति
१. अन्वयः—(हे) गाङ्ग-काकाक-गाहक, अ-हाहाऽङ्ग, ख-गाङ्गाग-कङ्क,
अघक-काक-हा अग-खग-काककः (त्वम्) गाम् अगाः । रत्नश्रीज्ञानने
पद्यके अन्तिम शब्दको भी सम्बोधन ही माना है। इस पाठमें कण्ठ्य वर्णों
में विसर्ग रह जाता है। अतः पूर्वार्धके अन्तमें प्रथमान्तके समान उत्तरार्ध
के अन्तमें भी प्रथमान्त पाठ विसर्गका भी समावेश हो जानेसे उचित है ।
२. एक-विंशत्यमी स्वर्गा निविष्टा मेरु-मूर्धनि ।। नृसिंहपुराण ३०।२४
सरित्स्नायी・・・निर्मलं स्वर्गमाप्नोति・・・॥ ३७
३. 'अः, ‿ क, ‿ प, अं' (ऋक्प्रातिशाख्य, विष्णुमित्रकृत वर्गद्वयवृत्तियुत,
पृष्ठ १६) तक प्रोक्त वर्णराशिमें स्वर और अनुस्वारसे इतर वर्णोंको
शौनक‌ने 'व्यञ्जन' कहा है : सर्वः शेषो व्यञ्जनान्येव (ऋ प्रा १।६) ।
विसर्गकी गणना व्यंजनोंमें भी ऊष्म वर्णोंमें की है : प्रथमपञ्चमौ च द्वा
ऊष्मणाम् । केचिदेता उरस्यौ (ऋ प्रा १।३८-३६) ।