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सर्वकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 132, कुल 270 में से

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पृष्ठ 132

३।८६] ३. वर्ण-नियम चित्र बन्ध : (१.३) द्विस्वरनियमवान् १०६
(१.३) श्री-दीप्ती, ह्री-कीर्ती, धी-नीती, गीः-प्रीती ।
एधेते द्वे द्वे ते, ये नेशे देवेशे ॥ ८६ ॥
(१.३ क) लक्ष्मी और तेज, (ख) लज्जा और यश, (ग) प्रज्ञा और
नीति, (घ) वाणी और प्रीति ये दो-दो तुम्हारे ही वृद्धिको प्राप्त हो रही
हैं, जो कि देवराज (इन्द्र) में (या हे राजन्, शिवमें) नहीं हैं ॥ ८६ ॥
गति' छन्दमें की है। यह अन्यत्र 'अमृतगतिका', 'अमृततिलका', 'त्वरितगति'
नामोंसे भी अभिहित है। अन्यत्र इसे 'कुलटा' नाम भी दिया है। इसमें न,
ज, न, ये तीन गण तथा अन्तमें एक गुरु होता है और प्रत्येक पाँचवें अक्षरपर
यति होती है। पाँचवाँ अक्षर ही गुरु भी होता है१ ॥ ८५ ॥
(१.३) दो स्वरोंके नियम वाला चित्र बन्ध—षडक्षर गायत्री जातिके 'शेषा',
'शेषराज' अपरनामक 'विद्युल्लेखा' छन्दमें२ निबद्ध प्रकृत छियासीवें श्लोकमें
कविने अपने वर्ण्य राजाको श्री आदि आठ गुणोंके चार युग्मोंमें देवराज या
शिवसे भी बढ़कर बताया है। ये दो-दो गुणोंके चारों युग्म न इन्द्रमें हैं न शिव
में; परन्तु वर्ण्य राजा में ये वर्धमान अवस्थामें (एधेते) हैं; कहाँ जाकर रुकेंगे,
कोई नहीं कह सकता । (१) इन्द्रमें श्री तो है, पर दीप्ति (तेज) विलासिता
के कारण नहीं है। जब भी शत्रुओंका आक्रमण होता है, दौड़े जाते हैं ब्रह्मा,
विष्णु, महेशके या और तो और किसी पार्थिव प्राणीके ही पास सहायता
लेनेको । (२) देवराज हैं, पर उनमें न लज्जा है, न यश । कामुकके रूपमें
निर्लज्जकी प्रसिद्धि अलबत्ता अवश्य है। यह उनकी सहस्राक्षता से ही
व्यक्त होता है । (३) कामुकमें बुद्धि होती भी है, तो वह नीतिका
अनुसरण नहीं करती । (४) ऐसे स्वार्थप्रेरित पुरुषमें मधुर वाणी और
उससे सम्पाद्य प्रीति भी दुर्लभ ही होती है ।३ श्मशानवास, दिगम्बरता,
१. दिअवर हार पअलिआ पुण वि तह डिअ करिआ ।
वसु-लहु वे गुरु सहिआ अमिअगइ, धअ कहिआ ॥ प्राकृतपैङ्गल २।६६
कुलटा स्यान्नजनगा, पञ्चभिः पञ्चभिर्यतिः ।
२. वाराहा मत्ता जं कण्णा तीआ होतं ।
हारा छक्का बन्धो सेसा राजा छन्दो ॥ प्राकृतपैङ्गल २।४२
वृत्तरत्नाकर ३।६ : विद्युल्लेखा मो मः । नारायण भट्ट : गायत्री तककी
जातिके छन्दोंमे पादान्तयति होती है, यह छान्दस उपदेशपरम्परा है ।
३. कविका प्रेरणास्रोत श्रीमद्भागवत (८।८।२०) प्रतीत होता है :
कश्चिन्महांस्तस्य न कामनिर्जयः, स ईश्वरः किं ? परतो व्यपाश्रयः ॥