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सर्वकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 123, कुल 270 में से

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पृष्ठ 123

१०० काव्यदर्श [ ३ । = १
(२) मनोभव, तवानीकं नोदयाय न मानिनी ।
भयादमेयामामावा वयमेनोमया नत ॥ ८१ ॥
(२) हे मनमें होने वाले (कामदेव), मानवती सुन्दरी रूपी तुम्हारी
सेना उदय (विजय) में समर्थ नहीं, ऐसा नहीं है । हे निकृष्ट, (उसके) भयसे
अपरिमेय विरहज्वरसे बँधे हुए हम पापी हैं (जो मिलन नहीं हो पा रहा
है) ॥ ८१ ॥
कर्मकाण्डमें 'सर्वतोभद्र' मण्डलके समान कोष्ठबन्धके कारण इसे यह नाम
दिया गया है ॥ ८० ॥
(२) अर्ध-भ्रम चित्र बन्ध—इस श्लोकमें कविने किसी प्रेमीकी विप्रलम्भ-
रतिका वर्णन उसके द्वारा कामदेवको उलाहना दिलानेसे किया है : काम-
देवकी सुन्दरी रूपी सेना बड़ी मानिनी (हठीली) है; वह जिसे पराजित
करना धार ले, उसे पराजित किये बिना चैन नहीं लेती; हमेशा सफल रहने
के कारण भी उसे बड़ा मान है । इस प्रकारकी यह सेना कामदेवके लिये
उदयकारी (विजयदायिनी) न हो, यह सम्भव नहीं है । वह मुझसे रूठी
है । यह हमारा ही पाप है कि हम उस सेनाके भयसे अपरिमित आम (रोग,
पीड़ा, प्रेम ज्वर) के बन्धनमें जकड़े बैठे हैं । हे काम, तुम बड़े निकृष्ट (नत)
हो, जो इस प्रकार पीड़ा दे रहे हो ।
अमेयामामावाः—अमनम् आमः, अम रोगे (भ्वादि०), भावे घञ् ।
अमेयः मातुं न शक्यश्चासावामः अमेयामः । आ समन्तात् मनसि, बुद्धौ, सर्वा-
ङ्गेषु च मवनं मावः बन्धनम् आमावः । अमेयामस्य आमावः (षष्ठी तत्पुरुष)
अमेयामामाव एषामिति अमेयामामावाः (मत्वर्थीय अच्) ।
१ ३ ५ ७ ८ ६ ४ २
| म नो भ व ↑ | त वा नी कं
| नो द या य | न मा नि नी ।
| भ या द मे | या मा मा वा
↓ | व य मे नो | म या न त ॥
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