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सर्वकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 120

३।७८] २. चित्र बन्ध : (१) गो-मूत्रिका दुष्कर बन्ध ६७
(१) वर्णानामेक-रूपत्वं यद्येकान्तरमर्धयोः ।
गो-मूत्रिकेति तत् प्राहुर्दुष्करं तद्विदो, यथा ॥ ७८ ॥
(१) दो अर्धों (श्लोकके पूर्वार्ध और उत्तरार्ध) में (परस्पर) एकेक वर्णका
अन्तर करके अगर वर्णोंमें एकरूपता रहती है, तो उस दुष्कर एकरूपताको
दुष्करके जानकार लोग 'गो-मूत्रिका' कहते हैं । जैसे—॥ ७८ ॥
तत्त्वसे रहित होनेके कारण इस प्रकारके वर्णविन्यासको 'चित्र' कहते हैं ।
(२) आकृतिविशेषसे युक्त होनेसे यह चित्र होता है । (३) आश्चर्यकारी
होनेसे यह चित्र कहलाता है ।१
निष्कर्षः (१) दण्डी और भोजके मतमें अलङ्कारोंकी चित्रताका आधार
आश्चर्यकारिता है, आकार नहीं, और न ही इन दोनोंका यथायोग्य समन्वय
है । (२) रुद्रटने आकार और वैचित्र्यको यथायोग्य रूपमें चित्रताका प्रयोजन
माना है । (३) औदीच्य आचार्योंमें ध्वनिवादी आचार्योंका मत आकार-
सादृश्यसे चित्रत्व माननेका ही विस्तार है ।
विचित्र निवन्धन वाले चित्रालङ्कारोंमें से (१) 'यमक' के सुकर और
दुष्कर भेदोंका निरूपण दण्डी जितने व्यवस्थित और समग्र रूपमें सम्भवतः
किसी अन्य अलङ्कारशास्त्रीने नहीं किया है। (२) आकारवैचित्र्यनिबन्धन
वाले चित्र शब्दालङ्कारोंमेंसे आचार्यने केवल (i) गोमूत्रिका, (ii) अर्धभ्रमक,
तथा (iii) सर्वभ्रमण सर्वतोभद्र बन्धोंका निरूपण अन्य बन्धोंके उपलक्षणार्थ
(७८-८२ में) किया है । (३) स्वर, स्थान और व्यञ्जनोंके नियमके वैचित्र्य
वाले चित्र वर्णनियम शब्दालङ्कारका निरूपण भी उपलक्षणार्थ ८३-६५
श्लोकोंमें १२ उदाहरणोंसे किया है ।२
(१) गोमूत्रिका दुष्कर बन्ध—श्लोकके चार पाद दो अर्धोंमें निबद्ध
होते हैं । प्रथम और द्वितीय पादोंसे पूर्वार्ध बनता है और तृतीय एवं चतुर्थ
१. रत्नदर्पण २।१०६ : (१) 'चित्रम् = आलेख्यम् । तदिव जीवितस्थानीय-
ध्वनिरहितं चित्रम् ।' इति काश्मीरकाः । तदसद्—ध्वनेः प्राधान्या-
नङ्गीकारात् प्रतीयमानमात्राभावस्य क्वचिदप्यसम्भवात् । (२) यद्
वा 'आकृतिविशेषयुक्तं चित्रम्' इति । तदपि न, अव्यापकत्वात् । (३)
अतो 'वर्णादिनियमेन प्रवृत्तमाश्चर्यकारितया चित्रम्' इत्येव युक्तम् ।
२. चित्रबन्धोंके भरपूर प्रदर्शनके लिये प० हृषीकेश चतुर्वेदीकी हृषीकेश-
ग्रन्थावली देखें ।