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सर्वकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 107, कुल 270 में से

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पृष्ठ 107

८४ काव्यदर्श [३।७२
लपालप चलने वाली भुजाएं जैसे मानको वहन करने वाला अक्षदण्ड हैं ।
लोगोंको इनका बड़ा सहारा मिलता है। निश्चय ही धराका भोग (पालन
और सुखलाभ) करने वाले लोगोंकी भुजायें ऐसी होती हैं ।
यहाँ (१) 'धरा' शब्दकी आवृत्ति प्रथम पादके आदिमें और (२)
मध्यमें अव्यवहित रूपसे दो बार हुई है । (३) 'धराधरा' की व्यवहित रूपसे
हुई है। (४) प्रथमपादान्तके 'भुजाम्' की, द्वितीय पादान्तके 'क्षमा' की,
तृतीयपादान्तके 'श्यो' की अगले पादोंके आदिमें अव्यपेत आवृत्तिसे भरतका
'चक्रवाल' तथा दण्डीका 'सन्दष्ट' यमक (द्र० श्लोक ५१-५२) निष्पन्न हुआ
है । (५) द्वितीय पादके मध्यमें स्थित 'मही' की मध्यमें ही दो अक्षरोंके
व्यवधानसे आवृत्तिसे पादमध्य व्यपेत यमक है । (६) तृतीय पादके प्रथम
भागके अन्तमें स्थित 'सह' की मध्य भागमें एकाक्षर व्यवहित आवृत्ति है,
तथा यदि ह्रस्व, दीर्घमें वर्णभेद न मानें, तो (७) मध्यके 'सह' की पादान्तके
आदिमें 'साह' के रूपमें अव्यवहित आवृत्ति है । (८) चतुर्थ पादके आदिभागके
अन्तकी ओर स्थित 'धुरा' की पादमध्यमें अक्षरद्वयव्यवहित आवृत्तिसे आदि-
मध्य व्यवहित यमक है । इस प्रकार यहाँ एक पद्यमें ८ यमकोंका मिश्रण है ।
इनमेंसे १-३ में परस्परोपकार्योपकारक भाव सम्बन्धसे अङ्गाङ्गिभाव सङ्कर
है । ६-७ में निरपेक्षता है । चारों पादोंमें वर्तमान होनेसे ४ सन्दष्ट यमक
सबमें चारुत्वकी दृष्टिसे मुख्य है । शेष यमक परस्परसङ्कीर्ण और परस्पर
तुल्यबल हैं । अतः श्लोकमें अधिक प्रभाव सङ्कीर्ण और असङ्कीर्ण यमकोंकी
संसृष्टिका है । इस प्रकार यह श्लोक तृतीय श्लोकोक्त सम्भेदयोनि यमकोंका
उदाहरण है ।
मानधुरा वलम्बिनः—मानस्य धुरः = मानधुराः, मान+धुर्+अ
(समासान्त) १+टाप्, प्रथमा बहुवचन । भुजाओंपर मानधुराओंका आरोप
है । 'धुर्' नित्य स्त्रीलिङ्ग है, अतः 'मानधुराः' भी स्त्रीलिङ्ग है । उपमेय
'भुज' स्त्री-पुं-लिङ्ग है : भुजा, भुज ।२ 'अव' के आदिम 'अ' का भागुरिके मत
में लोप होनेसे 'वलम्बिनः' है । अन्य लोगोंने 'मानधुरावलम्बिनः' को समस्त
पद माना है । पर इससे अर्थमें कोई विशेष शोभा नहीं आती । दोनोंको
पृथक् करनेसे 'भुजा मानधुरा' रूपक या वाचकलुप्ता उत्प्रेक्षा निष्पन्न हो
१. अष्टाध्यायी ५।४।७४ : ऋक्पूरब्धूःपथामानक्षे ।
२. अमरकोष २।६।७६-८० : द्वौ परौ द्वयोः ॥ भुजबाहू, प्रवेष्टो, दोः
स्यात् । मेदिनी ८।१२-१३ : अथो भुजा ।। द्वयोर्बाहौ करे ।