कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
कवितावली २२४
तुलसी सभीतपाल सुमिरैं कृपाल राम
समय सुकरुना सराहि सनकार दी ॥१८३॥
आश्रम और वर्ग कलिके प्रभावसे विकलङ्ग हो गये और
सबने अपनी-अपनी मर्यादाको भारस्वरूप समझकर त्याग दिया।
शिवजीका कोप तो महामारीसे ही प्रकट है, स्वामीके कुपित
होनेके कारण ही संसारका दारिद्र्य दिनों-दिन बढ़ता जाता है।
स्त्री-पुरुष सब आर्त होकर पुकारते हैं, किन्तु उनकी पुकार कोई
नहीं सुनता। [मालूम होता है] किन्हीं देवताओंने मिलकर
मूठ चला दी थी (अभिचारका प्रयोग किया था); किन्तु
भयभीतोंकी रक्षा करनेवाले कृपालु श्रीरामको स्मरण करते ही
उन्होंने अपनी करुणाकी प्रशंसा करके उसे समयपर अपना काम
करनेका संकेत कर दिया [जिससे वह बीमारी बात-की-बातमें
चली गयी]।
समाप्त
कुछ प्रतियोंमें १७७ छन्द ही मिलते हैं। काशी-नागरीप्रचारिणी
सभाकी प्रतिमें १८३ छन्द हैं। अतः १८३ छन्द रखे गये हैं।
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